पॉइंट 5140 तक का कठिन रास्ता
तोलोलिंग पर जीत हासिल करने के बाद भी भारतीय सेना के लिए कारगिल की जंग खत्म नहीं हुई थी। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पॉइंट 5140 पर दुश्मन का कब्जा था, जो भारतीय जांबाजों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था। इस चोटी तक पहुंचने के रास्ते में रॉकी नॉब नाम की जगह मुख्य बाधा के रूप में खड़ी थी, जहां दुश्मन अपने मजबूत संगरों में छिपकर बैठा था।
नेतृत्व में बदलाव और चुनौतियों का दौर
जून 1999 के मध्य में 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स को पॉइंट 5140 तक पहुंचने के लिए रॉकी नॉब जीतने का जिम्मा सौंपा गया। 15 जून को जब ऑपरेशन शुरू हुआ, तो बटालियन के सामने अचानक बड़ी कठिनाइयां आईं। कमांडिंग ऑफिसर को मेडिकल कारणों से कार्यमुक्त करना पड़ा, जिसके बाद मेजर वाईके जोशी को लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत कर कमान सौंपी गई। इसी दौरान दुश्मन की भारी गोलाबारी में मेजर एएस जसरोटिया ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, जिससे सैनिकों का संकल्प और अधिक कठोर हो गया।
बोफोर्स की एंट्री और बाजी पलटने वाली रणनीति
दुश्मन के पत्थर से बने मजबूत संगर सामान्य हमलों और रॉकेट लॉन्चरों से नष्ट नहीं हो पा रहे थे। जब सामान्य तरीके से सफलता नहीं मिली, तो भारतीय ब्रिगेड ने 155 मिमी बोफोर्स तोपों का सीधा इस्तेमाल करने का साहसी निर्णय लिया। इन तोपों को ऐसी जगह तैनात किया गया जहां से दुश्मन के ठिकाने सीधे निशाने पर थे। बोफोर्स की गर्जना ने दुश्मन की डिफेंस लाइन को ध्वस्त कर दिया और उनके सैनिक अपनी पोजीशन छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए।
सफलता और रणनीतिक जीत
बोफोर्स के सटीक हमलों के बाद 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स ने तेजी से आगे बढ़कर रॉकी नॉब के साथ-साथ हंप्स IX और हंप्स X पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस संघर्ष में दुश्मन के आठ सैनिक मारे गए और भारी मात्रा में गोला-बारूद बरामद हुआ। मेजर एस. विजय भास्कर के नेतृत्व में 'ए' कंपनी ने इस कठिन मिशन को अंजाम तक पहुंचाया। रॉकी नॉब की इस जीत ने न केवल पॉइंट 5140 का रास्ता साफ किया, बल्कि भारतीय सेना के अदम्य साहस और सही समय पर लिए गए सटीक फैसलों की मिसाल भी पेश की।
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