बस्तर में बोधघाट बांध परियोजना का विरोध तेज, आदिवासियों ने दी चेतावनी

छत्तीसगढ़ के बस्तर में बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ गया है। आदिवासियों ने साफ किया है कि वे विकास के नाम पर अपनी जमीन और जंगल नहीं छीनने देंगे।

विरोध की नई लहर

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में बोधघाट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की सरकारी तैयारियों ने आदिवासी समुदायों को आंदोलित कर दिया है। पिछले कई दिनों से क्षेत्र में भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, जहां ग्रामीण अपनी जमीनों को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि पहले हमें गोली मारो, फिर बांध बनाओ

हजारों परिवारों पर संकट

स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर यह परियोजना धरातल पर उतरती है, तो डूब क्षेत्र के दायरे में आने के कारण हजारों परिवारों को अपने पुश्तैनी घरों से हाथ धोना पड़ेगा। ग्रामीणों के मुताबिक, इस बांध के निर्माण से न केवल उनकी खेती की जमीनें छिन जाएंगी, बल्कि बड़े पैमाने पर जंगल और प्राकृतिक संसाधन भी नष्ट हो जाएंगे, जो उनके जीवन का मुख्य आधार हैं।

पहचान और संस्कृति से जुड़ा मुद्दा

आदिवासी समुदाय का तर्क है कि उनके लिए जंगल और भूमि केवल संपत्तियां नहीं हैं, बल्कि ये उनकी सदियों पुरानी संस्कृति और पहचान का अटूट हिस्सा हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले उनसे कोई सार्थक चर्चा नहीं की और न ही उनकी सहमति ली गई। उन्होंने मांग की है कि सरकार इस परियोजना के सभी संभावित प्रभावों का ब्यौरा सार्वजनिक करे और निर्णय लेने की प्रक्रिया में ग्राम सभाओं की राय को सर्वोपरि रखे।

सरकारी तर्क और ग्रामीणों का रुख

दूसरी तरफ, सरकारी पक्ष का मानना है कि बोधघाट परियोजना से बिजली उत्पादन में वृद्धि होगी और क्षेत्र में विकास की नई संभावनाएं खुलेंगी। हालांकि, इस पर स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी भी प्रकार का विकास तब तक सार्थक नहीं है, जब तक उसमें प्रभावित होने वाले लोगों की सहमति और उनके हितों का सम्मान न हो। बस्तर का यह इलाका फिलहाल तनावपूर्ण स्थिति में है और आदिवासी संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी जमीन बचाने के लिए हर स्तर पर संघर्ष जारी रखेंगे।

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