पारंपरिक खेती से हटकर अमरूद की बागवानी
भागलपुर जिले का नवगछिया इलाका, जिसे कभी मक्का और केले की खेती के लिए जाना जाता था, अब बागवानी में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। यहां के किसान अब मक्के और केले की जगह अमरूद की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह अमरूद की खेती से होने वाली बेहतर कमाई और फसल में रोगों की कम समस्या है।
गोपाल सिंह ने दिखाई नई राह
नवगछिया के तेतरी गांव के रहने वाले किसान गोपाल सिंह ने अपने 10 एकड़ खेत में केले और मक्के की खेती को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है। गोपाल सिंह का कहना है कि केले की फसल में लगने वाले लगातार रोगों और मक्के से मिलने वाले सीमित मुनाफे से परेशान होकर उन्होंने अमरूद की बागवानी का निर्णय लिया। शुरुआती दौर में उन्होंने इलाहाबादी किस्म के पौधे लगाए थे, जो स्थानीय जलवायु के अनुसार ज्यादा सफल नहीं हुए। इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड की वीएनआरबीसी किस्म को चुना, जो अब उनके खेतों में शानदार परिणाम दे रही है।
पौधरोपण और खेती की तकनीक
विशेषज्ञों और सफल किसानों के अनुसार, अमरूद लगाने का मौजूदा समय सबसे उपयुक्त है। किसान गोपाल सिंह ने बागवानी के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:
- एक एकड़ खेत में लगभग 110 से 130 अमरूद के पौधे लगाए जा सकते हैं।
- पौधों को शाम के समय रोपना अधिक बेहतर होता है।
- अगली सुबह हल्की सिंचाई करने से पौधे जल्दी जम जाते हैं और उनके खराब होने का खतरा कम रहता है।
अमरूद की खेती में मुनाफा
वीएनआरबीसी किस्म के अमरूद अपने बड़े आकार और मिठास के लिए बाजार में काफी पसंद किए जा रहे हैं। आर्थिक पहलुओं पर नजर डालें तो:
- स्थानीय बाजार में यह अमरूद 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक आसानी से बिक जाता है।
- एक पेड़ से औसतन 50 से 80 किलो अमरूद का उत्पादन मिलता है।
- यदि पौधों की देखभाल अच्छी हो, तो एक पेड़ से एक क्विंटल तक उत्पादन की संभावना रहती है।
कम लागत में अधिक मुनाफा देने के कारण भागलपुर के नवगछिया और आसपास के क्षेत्रों में अमरूद की खेती किसानों के लिए एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। इस क्षेत्र में अब अन्य फलों जैसे एपल बेर, सेब और नारंगी की खेती को भी काफी बढ़ावा मिल रहा है।
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