न्यायिक समीक्षा और RTI से बाहर कॉलेजियम के फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के चयन के लिए कॉलेजियम द्वारा लिए गए फैसले न तो न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं और न ही इन्हें सूचना के अधिकार यानी RTI अधिनियम के तहत चुनौती दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इस पूरी चयन प्रक्रिया में अदालत का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।
अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की अवकाशकालीन पीठ ने हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर यह सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का पालन नहीं किया और उनकी उम्मीदवारी को सही तरीके से नहीं परखा। वकील बलबीर सिंह ने दलील दी कि 6 सितंबर 2024 के फैसले के बावजूद कॉलेजियम ने व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय लिए, जो कि सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के विरुद्ध है।
कॉलेजियम की प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इनकार
सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि वे इस प्रक्रिया के माध्यम से किसी भी तरह के विवाद या 'पैंडोरा बॉक्स' को खोलना नहीं चाहते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जजों का चयन पूरी तरह से कॉलेजियम के सब्जेक्टिव सैटिस्फेक्शन पर निर्भर करता है। पीठ ने आगे कहा कि किसी उम्मीदवार की उपयुक्तता कई पैमानों पर जांची जाती है, और केवल वरिष्ठता ही किसी व्यक्ति को हाईकोर्ट का जज बनने का कानूनी अधिकार नहीं देती। यदि किसी कनिष्ठ अधिकारी की सिफारिश की जाती है, तो वरिष्ठ अधिकारी को इसे कानूनी चुनौती देने का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं होता।
नियुक्ति प्रक्रिया की गोपनीयता
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जब एक बार हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सभी दस्तावेजों और सरकारी सामग्री का आकलन कर अंतिम फैसला ले लेता है, तो उस निर्णय की शुद्धता पर किसी भी न्यायिक मंच से बहस नहीं की जा सकती। गौरतलब है कि 2 जून को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में जज नियुक्त करने की मंजूरी दी थी। हालांकि, अदालत ने अरविंद मल्होत्रा को लंबित विभागीय जांच को समयबद्ध तरीके से पूरा कराने के लिए हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रखने की अनुमति दी है।
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