सिंघाड़े की खेती से होगा बंपर मुनाफा
सारण जिले के किसान अब धान और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों के साथ ही सिंघाड़े की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन किसानों के पास निचले खेत या गड्ढे हैं, जहां जलजमाव की समस्या बनी रहती है, वे सिंघाड़े यानी पानी फल की खेती कर मालामाल हो सकते हैं। छपरा के करिंगा गांव सहित कई इलाकों में किसान बड़े पैमाने पर इसकी रोपाई कर रहे हैं।
रोपाई का सही समय और तरीका
सिंघाड़े की रोपाई के लिए जून और जुलाई का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इसकी प्रक्रिया को विस्तार से समझें:
- जनवरी-फरवरी: इस समय सिंघाड़े के बीज डाले जाते हैं।
- मई-जून: बीज अंकुरित होकर छोटे पौधों में बदल जाते हैं।
- रोपाई: जून-जुलाई के दौरान इन पौधों को तालाब या गहरे गड्ढे वाले खेतों में धान की तरह रोपा जाता है।
जैसे-जैसे मानसून की बारिश से पानी का स्तर बढ़ता है, सिंघाड़े की बेलें पानी की सतह पर फैलने लगती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, बेलें जितनी ज्यादा फैलेंगी, पैदावार उतनी ही अधिक होगी। फसल को कीटों से बचाने के लिए समय-समय पर दवाओं का छिड़काव भी जरूरी है।
इन प्रखंडों में होती है बड़े स्तर पर खेती
छपरा जिले के कई ऐसे इलाके हैं जहां किसान पारंपरिक खेती छोड़कर सिंघाड़े को प्राथमिकता दे रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से छपरा सदर, गरखा, रिविलगंज, मांझी और मशरख प्रखंड शामिल हैं।
स्थानीय किसान की जुबानी
करिंगा गांव के निवासी रामचंद्र प्रसाद अपनी परिवार की चौथी पीढ़ी के साथ इस खेती से जुड़े हैं। वे बताते हैं, चार बीघे खेत में सिंघाड़े की खेती करने के लिए कम से कम 3 फीट पानी की आवश्यकता होती है। सितंबर से फल आना शुरू हो जाते हैं और नवंबर तक बंपर पैदावार प्राप्त होती है। उनका कहना है कि इस खेती से होने वाली कमाई इतनी पर्याप्त है कि उन्हें आजीविका के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्होंने अन्य किसानों को सलाह दी है कि जो किसान बेहतर मुनाफा चाहते हैं, वे सही समय पर सिंघाड़े की रोपाई जरूर करें।
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