सिस्टम की अनदेखी और 15 जिंदगियों का अंत
लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया इलाके में घटी दर्दनाक घटना ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। इस अग्निकांड में 15 छात्रों की असामयिक मृत्यु ने यह साबित कर दिया है कि सुरक्षा मानकों को ताक पर रखने का परिणाम कितना घातक हो सकता है। हालांकि इस मामले में शासन द्वारा कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कार्रवाई इस बड़ी साजिश या लापरवाही के लिए पर्याप्त है।
इन विभागों की भूमिका पर उठे सवाल
इस त्रासदी के लिए किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना काफी नहीं है। जमीनी स्तर पर जांच करने पर यह स्पष्ट होता है कि कई विभागों की मिलीभगत और सुस्ती ने इस इमारत को एक गैस चैंबर में तब्दील कर दिया था। मुख्य रूप से निम्नलिखित विभाग इस घटना के लिए जवाबदेह हैं:
- लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA): बिना नक्शा पास कराए और अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई न करना।
- नगर निगम: व्यावसायिक गतिविधियों के लिए रिहायशी इलाके में अनुमति की जांच में विफलता।
- जिला प्रशासन: सुरक्षा मानकों और लाइसेंसिंग प्रक्रिया की निगरानी में कमी।
- स्थानीय पुलिस: क्षेत्र में चल रही अनधिकृत गतिविधियों की सूचना न लेना।
- फायर विभाग: अग्निशमन यंत्रों की कमी और सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज करना।
भ्रष्टाचार और कागजी कार्रवाई का खेल
पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि रिहायशी इलाकों में बिना वेंटिलेशन और बिना वैध लाइसेंस के पेट क्लीनिक जैसी व्यावसायिक गतिविधियां धड़ल्ले से चल रही थीं। प्रशासन केवल कागजों पर नोटिस भेजने का औपचारिकता निभाता रहा, जबकि हकीकत में जमीन पर कोई भी सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू नहीं था। प्रशासनिक साठगांठ ने इन छात्रों को मौत के मुंह में धकेलने का काम किया है। अब देखना यह है कि क्या केवल निलंबन की कार्रवाई से आगे बढ़कर सरकार इन दोषी विभागों के जिम्मेदार आला अधिकारियों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसती है या नहीं।
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