निर्जला एकादशी का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे अधिक फलदायी माना गया है। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ने वाला यह व्रत भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त इस दिन बिना अन्न और जल के उपवास रखते हैं, उन्हें साल भर की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के परामर्श पर इस कठिन व्रत का पालन किया था। मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
पूजा सामग्री की सूची
निर्जला एकादशी की पूजा के लिए आप पहले से ही बाजार से निम्नलिखित सामग्री एकत्रित कर सकते हैं:
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर
- पीले वस्त्र
- पीले फूल और तुलसी के पत्ते
- चंदन और अक्षत (चावल)
- धूप, दीपक और शुद्ध घी
- पंचामृत और मौली (कलावा)
- नारियल और मौसमी फल
- केले, मिठाई या पंचमेवा
- गंगाजल, शंख और कपूर
- विष्णु सहस्रनाम या गीता की पुस्तक
- दान के लिए जल से भरा कलश, छाता, वस्त्र, फल और दक्षिणा
शुभ मुहूर्त और पारण का समय
पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि का विवरण इस प्रकार है:
- एकादशी तिथि का प्रारंभ: 24 जून, शाम 6 बजकर 12 मिनट से।
- एकादशी तिथि का समापन: 25 जून, रात 8 बजकर 09 मिनट तक।
- व्रत की तिथि: उदया तिथि के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून, दिन गुरुवार को रखा जाएगा।
- पारण का समय: 26 जून, सुबह 5 बजकर 25 मिनट से 8 बजकर 13 मिनट तक।
पूजा की विधि
व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। श्रीहरि को पीले वस्त्र, चंदन, अक्षत और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। इसके बाद धूप और दीप जलाकर विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। पूजा के समापन पर भगवान विष्णु की आरती करें और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें। ध्यान रहे कि स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ही इस व्रत का संकल्प लें। अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें।
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