पर्यावरण संरक्षण का सदियों पुराना इतिहास
आज के दौर में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संबंधी खतरों से निपटने के लिए जद्दोजहद कर रही है, तब बीकानेर के 1794 के ऐतिहासिक दस्तावेज एक बड़ी प्रेरणा देते हैं। इन दस्तावेजों से पता चलता है कि उस समय रेगिस्तान की जीवनरेखा माने जाने वाले खेजड़ी के पेड़ों को काटने को एक गंभीर जुर्म माना जाता था।
गुनहागारी का अनूठा कानून
बीकानेर रियासत ने उस दौरान खेजड़ी की कटाई को रोकने के लिए गुनहागारी नाम से एक आर्थिक दंड लागू किया था। इस कानून का मकसद सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य भी थे:
- मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखना।
- पशुधन और पशुपालन की आजीविका को सुरक्षित करना।
- कृषि योग्य भूमि की रक्षा करना।
- ग्रामीण इलाकों के निवासियों के जीवन स्तर को संबल प्रदान करना।
आधुनिक कानूनों की प्रेरणा
विशेषज्ञों का मानना है कि 230 साल पहले की यह व्यवस्था उस समय की सबसे दूरदर्शी और प्रभावशाली कानूनी पहल थी। आज के आधुनिक पर्यावरण संरक्षण कानूनों की नींव में इस तरह की पारंपरिक और ऐतिहासिक समझ को एक शुरुआती झलक के रूप में देखा जा सकता है। यह साबित करता है कि भारत की विरासत में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की संस्कृति बहुत पुरानी और मजबूत रही है।
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