पूजा में घंटी का महत्व और मान्यता
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान घंटी बजाना एक अनिवार्य परंपरा मानी गई है। फरीदाबाद के महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार, घंटी बजाना महज एक रस्म नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति हमारे सम्मान और उनके स्वागत का एक माध्यम है। यदि घंटी को सही तरीके से न बजाया जाए, तो पूजा अधूरी मानी जा सकती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घंटी का सीधा संबंध वेदों से है और इसे गरुड़ देव का स्वरूप माना जाता है।
मंदिर में प्रवेश करते समय बजाने का नियम
अक्सर लोग मंदिर से आते और जाते समय घंटी बजाते हैं, लेकिन यह तरीका गलत है। शास्त्रों के अनुसार, मंदिर में प्रवेश करते समय ही घंटी बजाना उचित होता है। मंदिर की छत से लटकी घंटी को या तो एक बार या फिर तीन बार बजाना चाहिए। इसके पीछे की आध्यात्मिक धारणा यह है कि भक्त भगवान के चरणों में शरण ले रहा है और वेदों के मंत्रों के माध्यम से ईश्वर का स्वागत कर रहा है। याद रखें, मंदिर से बाहर निकलते समय घंटी कभी नहीं बजानी चाहिए, क्योंकि घंटी बजाने का अर्थ भगवान का स्वागत करना है, न कि उन्हें विदा करना।
भगवान को भोग लगाते समय घंटी का उपयोग
घरों में पूजा के दौरान इस्तेमाल होने वाली छोटी घंटी को गरुड़ घंटी कहा जाता है। जब भी आप भगवान को भोजन या फल का भोग अर्पित करें, तो उस समय घंटी बजाना अनिवार्य है। महंत के मुताबिक, भोग लगाते समय पांच बार घंटी बजानी चाहिए। यह पांच बार की प्रक्रिया भगवान से भोग स्वीकार करने का विनम्र निवेदन है। साथ ही, पूजा के दौरान इस छोटी घंटी को हमेशा मंदिर में अपने बाईं ओर रखना चाहिए और दाएं हाथ का उपयोग भोग लगाने या आरती करने के लिए करना चाहिए।
सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पूजा और आरती के दौरान घंटी का सही उपयोग करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। जब आप नियमों के अनुसार घंटी बजाते हैं, तो यह आपकी श्रद्धा और प्रार्थना को ईश्वर तक सही ढंग से पहुँचाने का काम करती है। इन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर आप अपनी पूजा विधि को अधिक प्रभावी और शास्त्र सम्मत बना सकते हैं।
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