नौकरी छोड़कर खेती को बनाया व्यवसाय
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक युवा ने मिसाल पेश की है। एमकॉम की डिग्री हासिल करने के बाद मोनू तिवारी ने पारंपरिक राह से हटकर खेती में अपना भविष्य तलाशा है। उन्होंने पहले ऑटोमोबाइल सेक्टर में करीब 15 वर्षों तक काम किया, लेकिन अंततः उन्हें खेती में ही अपनी राह दिखी। आज वे पूरी मेहनत और लगन के साथ अपने खेतों को हाइटेक तरीके से संवार रहे हैं।
ढाई एकड़ में लगाए 20 हजार पौधे
मोनू तिवारी ने लगभग ढाई एकड़ जमीन पर 20 हजार ग्राफ्टेड बैंगन के पौधे लगाए हैं। इस खेती के लिए उन्होंने आधुनिक तौर तरीकों का पालन किया है। खेत की तैयारी के लिए सबसे पहले गोबर की खाद का उपयोग किया गया और उसके बाद बेड तैयार करके पौधों की रोपाई की गई। उन्होंने बताया कि ये पौधे वीएनआर कंपनी की 212 किस्म के हैं, जिन्हें रायपुर और अंबिकापुर के अलग-अलग फार्म से मंगवाया गया है। उनका मानना है कि ग्राफ्टेड पौधों की मजबूती और उत्पादकता सामान्य पौधों की तुलना में काफी ज्यादा होती है।
लागत और तकनीक का तालमेल
बैंगन की इस खेती में अब तक लगभग 3 से 4 लाख रुपये की लागत आई है। इसमें खाद, पौधों की खरीद और अन्य आवश्यक संसाधनों का खर्च शामिल है। मोनू तिवारी के अनुसार, खेती में लाभ पूरी तरह से बाजार के भाव पर निर्भर करता है। वे वैज्ञानिक प्रबंधन और सही तकनीक का उपयोग करके इसे एक मुनाफे वाला व्यवसाय बनाने में जुटे हैं। खेती से जुड़ी बारीकियां समझने के लिए उन्होंने इंटरनेट और गूगल का सहारा भी लिया, लेकिन अपनी मिट्टी के अनुसार किए गए प्रयोगों को वे सबसे अधिक महत्व देते हैं।
यूपी, बिहार और झारखंड में मांग
मोनू पिछले चार-पांच वर्षों से बैंगन की खेती कर रहे हैं। शुरुआत में उन्होंने छोटे स्तर पर प्रयोग किए और अब बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। वर्तमान में पौधों में फल आने लगे हैं और जल्द ही यह उपज बाजार में पहुंच जाएगी। मोनू बताते हैं कि उनके द्वारा उगाए गए बैंगन की मांग केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के बाजारों में भी काफी अच्छी है। उनका मानना है कि यदि सही प्रबंधन हो तो खेती कभी नुकसान का सौदा नहीं होती है।
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