सरगुजा: बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए बनाया जाता है 'फूंद्रा', मंत्रों से सिद्ध होता है यह धागा

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में नवजात शिशुओं को बुरी नजर और बीमारियों से बचाने के लिए एक प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है, जिसे फूंद्रा कहा जाता है।

परंपरा का प्रतीक है फूंद्रा

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आज भी लोग अपनी पुरानी मान्यताओं और पुरखों की विरासत को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। यहाँ नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए फूंद्रा नामक एक विशेष धागे का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में प्रचलित इस मान्यता के अनुसार, फूंद्रा को बच्चों के गले, हाथ या कमर में बांधने से उन्हें बुरी नजर नहीं लगती और वे बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं।

खास दिनों में तैयार होता है फूंद्रा

स्थानीय जानकारों का कहना है कि फूंद्रा को बनाने की प्रक्रिया बहुत खास होती है और इसे हर दिन नहीं बनाया जा सकता। इसके निर्माण की शुरुआत मुख्य रूप से मंगलवार या शनिवार को शुभ मुहूर्त में की जाती है। सिकंदर नामक एक स्थानीय निवासी ने बताया कि बाजार से काले रेशम का धागा खरीदकर इसे तैयार किया जाता है, जिसमें तीन से चार दिन का समय लगता है।

मंत्रों की शक्ति का है महत्व

फूंद्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसके निर्माण में उपयोग किए जाने वाले विशेष मंत्र हैं। यह परंपरा केवल कुछ चुनिंदा बुजुर्गों और जानकारों तक सीमित है, जिन्हें इसके निर्माण की विधि और गोपनीय मंत्रों का ज्ञान है। ग्रामीणों का मानना है कि केवल बाजार का धागा पहनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मंत्रोच्चार के साथ पारंपरिक विधि से तैयार किया गया फूंद्रा ही पूरी तरह प्रभावी होता है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा का विश्वास

ग्रामीण समाज में आज भी फूंद्रा को लेकर गहरा विश्वास है। बुजुर्गों का मानना है कि जन्म के बाद जब बच्चा फूंद्रा धारण करता है, तो वह न केवल बाहरी नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षित रहता है, बल्कि उसका स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है। यही कारण है कि आधुनिकता के दौर में भी सरगुजा के कई गांवों में यह परंपरा पूरी शिद्दत के साथ आज भी अपनाई जा रही है।

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