अंतरिक्ष में भारत का दबदबा
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं, लेकिन 22 जून, 2016 की तारीख भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में बेहद खास मानी जाती है। इस दिन इसरो ने अपने भरोसेमंद रॉकेट पीएसएलवी-सी34 के जरिए एक साथ 20 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित कर विश्व पटल पर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था। यह उपलब्धि न केवल भारत की तकनीकी दक्षता को दर्शाती थी, बल्कि दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी की साख को भी कई गुना बढ़ा दिया था।
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भरी उड़ान
आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9 बजकर 26 मिनट पर पीएसएलवी-सी34 ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी। इस मिशन का मुख्य आकर्षण 727.5 किलोग्राम वजनी कार्टोसैट-2 श्रेणी की सैटेलाइट थी। उड़ान भरने के करीब 16 मिनट 30 सेकेंड बाद यह मुख्य सैटेलाइट अपनी कक्षा में पहुंच गई, जिसके कुछ ही मिनटों के भीतर बाकी 19 सह-यात्री सैटेलाइट भी सफलता के साथ अंतरिक्ष में तैनात कर दिए गए।
विकास और तकनीक में कार्टोसैट-2 की भूमिका
इस मिशन का मुख्य हिस्सा कार्टोसैट-2 सैटेलाइट अत्याधुनिक कैमरों से लैस थी। इसकी उपयोगिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह पृथ्वी की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने में पूरी तरह सक्षम थी। इसका उपयोग सड़क नेटवर्क की निगरानी, जल संसाधन प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों के अध्ययन, भूमि उपयोग मानचित्रण और भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी जीआईएस जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया गया। इसने विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में बड़ी भूमिका निभाई।
युवा प्रतिभा और वैश्विक भागीदारी
इस मिशन की एक खास बात यह भी रही कि इसमें भारत के छात्र-छात्राओं द्वारा विकसित सत्यभामासैट और स्वयं नामक सैटेलाइट को भी अंतरिक्ष भेजा गया। इसके अलावा, इसरो ने इस उड़ान में 17 विदेशी सैटेलाइट को भी शामिल किया, जो कनाडा, जर्मनी, इंडोनेशिया और अमेरिका की थीं। इन 17 विदेशी सैटेलाइट में से 13 अमेरिका की थीं। इस अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने साबित कर दिया कि भारत का कमर्शियल स्पेस मार्केट अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है।
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