बघेलखंड की पहचान केवल उसकी बोली, लोकगीतों और संस्कृति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां के पारंपरिक पकवान भी लोगों के मन में खास जगह बनाए हुए हैं। ऐसा ही एक व्यंजन है गुलगुला, जिसे कई लोग मीठा पुआ के नाम से भी जानते हैं। गुड़, गेहूं के आटे और सौंफ से तैयार होने वाला यह पकवान गांव से लेकर शहर तक आज भी बड़े चाव से खाया जाता है। खास बात यह है कि इसे बनाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता और बेहद सामान्य सामग्री से तैयार होने के बावजूद इसका स्वाद किसी मिठाई से कम नहीं होता। शाम की चाय हो, कोई त्योहार हो या घर में कोई शुभ अवसर, गुलगुले की महक पूरे माहौल को मीठा बना देती है।
परंपरा से जुड़ा एक खास व्यंजन
बघेलखंड के घरों में गुलगुला महज एक पकवान नहीं, बल्कि परंपरा का हिस्सा माना जाता है। बरसों से महिलाएं इसे अपने घरों में बनाती आ रही हैं। गुड़ की प्राकृतिक मिठास और सौंफ की खुशबू इसे एक अलग ही स्वाद देती है। ग्रामीण इलाकों में आज भी मेहमानों के स्वागत और पारिवारिक आयोजनों में गुलगुले बनाए जाते हैं। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक स्वाद से गहराई से जुड़ी हुई है।
ऐसे तैयार करें गुलगुले का घोल
सतना निवासी मीना द्विवेदी बताती हैं कि स्वादिष्ट और मुलायम गुलगुले बनाने के लिए सबसे पहले एक कप गुड़ को डेढ़ कप गुनगुने पानी में अच्छी तरह घोल लेना चाहिए। इसके बाद इस घोल को छानकर ठंडा होने के लिए रख दें। अब दो कप गेहूं के आटे में एक चम्मच सौंफ और एक चौथाई चम्मच इलायची पाउडर मिला लें। फिर धीरे-धीरे गुड़ का पानी डालते हुए पकौड़े जैसा गाढ़ा घोल तैयार करें। ध्यान रहे कि घोल में किसी तरह की गुठली न रह जाए। इसके बाद घोल को ढककर लगभग 15 से 20 मिनट तक रखा रहने दें, ताकि वह अच्छी तरह फूल जाए।
तलने का सही तरीका देता है खास स्वाद
तलने से ठीक पहले घोल में एक चुटकी बेकिंग सोडा डालकर उसे अच्छी तरह फेंट लेना चाहिए। इसके बाद कड़ाही में तेल या घी को मध्यम आंच पर गर्म करें। हाथों को हल्का गीला करके उंगलियों की मदद से घोल को छोटी-छोटी बॉल्स के रूप में तेल में डालें। गुलगुलों को लगातार उलट-पुलट करते हुए मध्यम आंच पर करीब पांच से छह मिनट तक तलें। जब इनका रंग सुनहरा और गहरा भूरा हो जाए, तब इन्हें निकाल लें। इस विधि से बने गुलगुले बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम व जालीदार बनते हैं।
जन्मदिन और मांगलिक अवसरों का हिस्सा
पहले विंध्य क्षेत्र में केक काटने का चलन नहीं था। ऐसे में बच्चों के जन्मदिन, नामकरण, पूजा-पाठ या अन्य मांगलिक अवसरों पर सबसे पहले गुलगुले ही बनाए जाते थे। बुजुर्गों का मानना था कि घर में मीठा बनने और कड़ाही चढ़ने से सुख-समृद्धि का वास होता है। समय के साथ खान-पान की आदतें भले ही बदली हों, लेकिन बघेलखंड में गुलगुले का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।
लोक-संस्कृति में बसी मिठास
त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और खास मौकों पर गुलगुले की मौजूदगी आज भी देखने को मिलती है। बघेली लोकगीतों और लोक-संस्कृति में भी इसका जिक्र मिलता है। यही वजह है कि गुलगुला आज भी लोगों को उनके बचपन, गांव और पुरानी परंपराओं की मीठी यादों से जोड़ने का काम करता है।
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