अकबर इलाहाबादी उर्दू अदब के बेहद नामचीन और कद्दावर शायर, कवि और लेखक रहे हैं। उर्दू शायरी में हास्य और व्यंग्य के मैदान में उन्हें बेताज बादशाह का दर्जा हासिल है। उनका जन्म 16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद के पास बारा नामक जगह पर हुआ और 9 सितंबर 1921 को उनका देहांत हो गया।
वकालत से जज की कुर्सी तक का सफर
अकबर इलाहाबादी ने वकालत की तालीम हासिल की थी और सरकारी सेवा में रहते हुए वे सेशन कोर्ट के जज के ओहदे तक पहुंचे। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें 'खान बहादुर' का खिताब भी प्रदान किया था। दिलचस्प पहलू यह है कि अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था में ऊंचे पद पर बैठने के बावजूद उन्होंने अपनी शायरी के जरिए अंग्रेजी शासन, उसके तौर-तरीकों और पश्चिमी सभ्यता की नकल करने वालों पर बेबाक और तीखे तंज कसे।
शायरी की पुरानी लीक तोड़ी
अकबर से पहले उर्दू शायरी को अक्सर सिर्फ इश्क-मोहब्बत, शराब या राजा-महाराजाओं की प्रशंसा तक सीमित मान लिया जाता था। अकबर ने इस बंधे-बंधाए ढर्रे को पूरी तरह तोड़ दिया। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, राजनीति, धर्म और रोजमर्रा की जिंदगी को अपनी शायरी का विषय बनाया। ऊपरी तौर पर उनकी शायरी में हंसी और मजाक नजर आता था, लेकिन उसके भीतर समाज के लिए एक गहरा संदेश छिपा रहता था। यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। यहां हम आपके लिए अकबर इलाहाबादी के कुछ मशहूर शेर पेश कर रहे हैं।
अकबर इलाहाबादी के मशहूर शेर
1. हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
2. इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
3. मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं
4. एक काफ़िर पर तबीअत आ गई
पारसाई पर भी आफ़त आ गई
5. मुझ को तो देख लेने से मतलब है नासेहा
बद-ख़ू अगर है यार तो हो ख़ूब-रू तो है
6. शैख़ साहब ख़ुदा से डरते हों
मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूं
7. दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूं
8. आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी
9. वस्ल हो या फ़िराक़ हो 'अकबर'
जागना रात भर मुसीबत है
10. कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया
जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया
11. पूछा 'अकबर' है आदमी कैसा
हँस के बोले वो आदमी ही नहीं
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