मौजूदा दौर में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई परेशानियां लगातार सामने आ रही हैं। इन्हीं में से एक है डेवलपमेंटल डिले या डेवलपमेंटल डिसऑर्डर। कई बार बच्चे बड़े होते जाते हैं और उनकी उम्र 10, 20 या 30 साल तक पहुंच जाती है, मगर उनकी समझ, बर्ताव और खुद को जाहिर करने की क्षमता असल उम्र की तुलना में काफी पीछे रह जाती है। ऐसे कई मामलों में समाज ऐसे इंसान को 'पागल' मान बैठता है, जबकि हकीकत इससे अलग होती है। मनोविज्ञान का कहना है कि इन हालात में समय रहते पहचान सबसे अहम है, क्योंकि पहचान ही इलाज की पहली सीढ़ी मानी जाती है।
एक पिता की पीड़ा
पश्चिम बंगाल से बेगूसराय पहुंचे देवेंद्र राय ने बातचीत में बताया कि उनके बच्चे में भी इसी तरह की दिक्कत है। उन्होंने कहा कि अब तक इलाज पर करीब 2.50 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। वे रांची तक जाकर इलाज करा आए, लेकिन उन्हें कभी साफ तौर पर यह नहीं बताया गया कि आखिर बच्चे को समस्या क्या है। डॉक्टर बार-बार यही कहते रहे कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा, मगर वह वक्त कब आएगा इसका जवाब किसी के पास नहीं था। देवेंद्र राय का कहना है कि उन्हें लगता है उनका बच्चा शायद कभी ठीक नहीं हो पाएगा।
उनकी यह कहानी बताती है कि बीमारी की ठीक से पहचान न होने पर इलाज में जिंदगी भर की जमा-पूंजी खत्म हो जाती है। बच्चे उम्र के मुताबिक मानसिक रूप से विकसित नहीं हो पाते और समाज उन्हें सामान्य रूप से 'पागल' मानकर छोड़ देता है। ऐसे में सही पहचान और जागरूकता बेहद जरूरी हो जाती है।
क्या है डेवलपमेंटल डिले
इस विषय पर दुनिया के चर्चित मनोवैज्ञानिक इंजीनियर आर. शंकर ने जानकारी दी। आर. शंकर ने 150 देशों में इस विषय को पढ़ाया है और उनकी लिखी किताबें भी पढ़ी जाती हैं। उन्होंने बताया कि डेवलपमेंटल डिले का अर्थ है कि बच्चे का मानसिक विकास उसकी उम्र के अनुरूप नहीं हो पाता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई बच्चा 12 साल का है, लेकिन उसकी समझ 6 साल के बच्चे जैसी है, तो यह डेवलपमेंटल डिले का संकेत हो सकता है। यह दिक्कत सिर्फ समझ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भाषा, व्यवहार और सामाजिक कौशल को भी प्रभावित कर सकती है।
कई रूपों में सामने आती है समस्या
आर. शंकर ने आगे बताया कि डेवलपमेंटल डिले कई तरह का हो सकता है। कुछ बच्चे सामाजिक व्यवहार में पिछड़ जाते हैं और यह नहीं समझ पाते कि लोगों से किस तरह बातचीत करनी चाहिए। कुछ बच्चों में समझने और सीखने की क्षमता कमजोर रहती है, जिसे कॉग्निटिव डेवलपमेंट में देरी कहा जाता है। वहीं कुछ बच्चे अपनी बात ठीक से नहीं कह पाते और उनकी अभिव्यक्ति क्षमता उम्र के हिसाब से विकसित नहीं हो पाती।
आखिर कारण क्या हैं
इंजीनियर आर. शंकर के मुताबिक इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं। मस्तिष्क के विकास में आई कुछ कमियां, आनुवंशिक कारण और न्यूरोलॉजिकल विकास से जुड़ी समस्याएं इसके प्रमुख कारण मानी जाती हैं। कई बार बच्चे का शारीरिक विकास सामान्य रूप से चलता रहता है, लेकिन मस्तिष्क का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता।
उन्होंने बताया कि इस स्थिति में मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल फंक्शन प्रभावित हो सकते हैं। कुछ बच्चों में न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता जरूरत से कम होती है, जबकि कुछ में जरूरत से ज्यादा। दोनों ही हालात में बच्चे को चीजों को समझने, सीखने और प्रतिक्रिया देने में दिक्कत महसूस हो सकती है। इसी कारण उसकी मानसिक, सामाजिक और भाषाई क्षमताओं का विकास प्रभावित होता है।
इलाज के दो प्रमुख तरीके
आर. शंकर ने बताया कि डेवलपमेंटल डिले से जुड़े कई मामलों में न्यूरोलॉजिकल स्तर पर काम किया जाता है। उनके अनुसार अगर बच्चे के न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता (न्यूरो सेंसिटिविटी) सामान्य से कम होती है, तो तकनीकों के जरिए उसे बढ़ाने की कोशिश की जाती है, ताकि बच्चा चीजों को बेहतर ढंग से समझ और सीख सके। वहीं अगर बच्चे के न्यूरॉन्स की संवेदनशीलता जरूरत से ज्यादा होती है, तो उसे नियंत्रित करने पर काम किया जाता है।
उनके मुताबिक ऐसे मामलों में बच्चा जानकारी को सही तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाता, जिससे उसकी समझ, तर्क करने की क्षमता और अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि दोनों ही स्थितियों में अलग-अलग किस्म की तकनीकों के सहारे सुधार की कोशिश की जाती है।
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