पेट्रोल पंपों पर खुले कंटेनरों, कैनों और बोतलों में पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर लगाई गई पाबंदी का असर अब हिमाचल प्रदेश के किसानों और बागवानों पर साफ नजर आने लगा है। प्रदेश के कई हिस्सों में खेती और बागवानी से जुड़े कामकाज इस रोक की वजह से प्रभावित हो रहे हैं।
सरकार ने दिया समाधान का भरोसा
किसानों और बागवानों की बढ़ती दिक्कतों को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इस मसले को केंद्र सरकार के सामने रखने का आश्वासन दिया है। साथ ही तेल कंपनियों से बातचीत कर रास्ता निकालने की बात भी कही गई है।
मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने कहा कि नए आदेश के चलते प्रदेश में किसानों और बागवानों का काम प्रभावित हो रहा है। उन्होंने बताया कि सरकार इस विषय को केंद्र के सामने उठाएगी और आदेश में संशोधन की मांग करेगी। चौहान के मुताबिक राज्य सरकार तेल कंपनियों से भी बात करेगी, ताकि किसानों और जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों को राहत मिल सके।
क्या है नया आदेश
दरअसल, केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा जमाखोरी, कालाबाजारी और ईंधन के दुरुपयोग को रोकने के मकसद से “मोटर स्पिरिट एवं हाई स्पीड डीज़ल (खुदरा विक्रय केंद्रों के माध्यम से आपूर्ति का अस्थायी विनियमन) आदेश, 2026” लागू किया है। इसी के तहत खुले कंटेनरों और बोतलों में ईंधन देने पर रोक लगा दी गई है।
हालांकि इस व्यवस्था की सबसे बड़ी मार हिमाचल के बागवानी और कृषि क्षेत्र पर पड़ रही है। प्रदेश के कई इलाकों से किसानों और बागवानों ने शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें खेती और बागवानी के कामों के लिए पर्याप्त मात्रा में डीजल और पेट्रोल नहीं मिल पा रहा।
मशीनें पंप तक ले जाना मुश्किल
किसानों का कहना है कि वे अपनी मशीनों को सीधे पेट्रोल पंप तक नहीं ले जा सकते। पहले वे बोतल, कैन या गैलन में ईंधन भरकर ले जाते थे, लेकिन नए प्रतिबंधों के बाद उनकी परेशानी और बढ़ गई है।
इस समय प्रदेश के सेब बागानों में दवा छिड़काव का काम चरम पर है। पावर स्प्रेयर, पावर टिलर, घास काटने वाली मशीनें, ग्रास कटर, वुड कटर, पानी के पंप, मिनी ट्रैक्टर और अन्य कृषि उपकरण पेट्रोल और डीजल से ही चलते हैं। ईंधन न मिलने से इन मशीनों का संचालन प्रभावित हो रहा है और खेती-बागवानी की रफ्तार धीमी पड़ गई है। बागवानों को आशंका है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे तो इसका सीधा असर बागवानी सीजन, फसल प्रबंधन और उत्पादन पर पड़ सकता है।
किसान मंच की मांग
हिमाचल प्रदेश संयुक्त किसान मंच के प्रदेश संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि पाबंदी का मकसद भले ही सही हो, लेकिन इससे कृषि क्षेत्र को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पहचान पत्र और सत्यापन के आधार पर किसानों को सीमित मात्रा में ईंधन दिया जाना चाहिए। अपनी नाराजगी जताने के लिए वे खुद पावर टिलर लेकर पेट्रोल पंप पहुंचे और विरोध दर्ज कराया।
विधायक ने उठाए सवाल
इस मसले पर ठियोग से कांग्रेस विधायक कुलदीप सिंह राठौर ने भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल की अर्थव्यवस्था में बागवानी की अहम भूमिका है और ऐसे समय में किसानों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। राठौर ने बताया कि उन्होंने इस बारे में बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी और शिमला के उपायुक्त अनुपम कश्यप से भी बातचीत की है।
राठौर ने कहा कि एक ओर केंद्र सरकार ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर लगाई गई पाबंदियां किसानों और बागवानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी तरह की कमी नहीं है, तो फिर इतनी सख्त रोक की जरूरत क्यों पड़ रही है।
केंद्र से विशेष छूट का आग्रह
इसी बीच शिमला के उपायुक्त अनुपम कश्यप ने भी प्रदेश सरकार के जरिये भारत सरकार से इस मामले में विशेष छूट देने का आग्रह किया है। बीते दिन उपायुक्त की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय किया गया कि किसानों, बागवानों, मोबाइल टॉवर ऑपरेटरों और अन्य जरूरी बुनियादी सेवाओं के लिए डीजल आपूर्ति सुनिश्चित करने को लेकर केंद्र सरकार को पत्र भेजा जाए।
उपायुक्त ने अपने पत्र में कहा है कि शिमला जिला मुख्य रूप से बागवानी आधारित क्षेत्र है और यहां की बड़ी आबादी कृषि व बागवानी गतिविधियों पर निर्भर है। मौजूदा समय में कृषि और बागवानी का काम अपने चरम पर है और किसान पावर टिलर, स्प्रे पंप, जनरेटर तथा अन्य डीजल चालित उपकरणों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश के कई दुर्गम इलाकों में खेतों और बागानों तक मशीनों को पेट्रोल पंप तक ले जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में किसानों और बागवानों को कंटेनरों में सीमित मात्रा में ईंधन देने के लिए विशेष छूट या स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए। उन्होंने बताया कि इस सिलसिले में राज्य के मुख्य सचिव से भी बात की गई है।
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