राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपने समृद्ध इतिहास के लिए भी विशेष पहचान रखता है। इसी ऐतिहासिक धरोहर को माउंट आबू के सरकारी संग्रहालय ने सहेज कर रखा है, जहां छठी से बारहवीं शताब्दी तक की 412 से अधिक प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। इन सभी में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र प्राचीन चक्रबाहु शिव प्रतिमा है।
दोनों ओर से एक जैसी दिखने वाली अनोखी प्रतिमा
इस शिव प्रतिमा की खास बात यह है कि यह दोनों तरफ से बिल्कुल एक समान दिखाई देती है। आमतौर पर अन्य मूर्तियां केवल एक ही दिशा से पूरी नजर आती हैं, लेकिन इस प्रतिमा की बारीक नक्काशी दोनों ओर से एक जैसी है। करीब 2.5 फीट ऊंची यह मूर्ति लगभग 800 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
संग्रहालय में रखी अधिकांश प्रतिमाएं चंद्रवती नगरी के समकालीन हैं। यह नगरी 9वीं शताब्दी में परमार शासकों की राजधानी हुआ करती थी। कुछ प्रतिमाएं तो इससे भी कहीं अधिक प्राचीन हैं, जो खनन कार्य के दौरान इस क्षेत्र से निकली थीं। ये मूर्तियां उस दौर की उत्कृष्ट निर्माण शैली को दर्शाती हैं।
1962 में स्थापित हुआ संग्रहालय
माउंट आबू के राजभवन परिसर में स्थित यह सरकारी संग्रहालय वर्ष 1962 में स्थापित किया गया था और इसे 1965 में आमजन के लिए खोला गया। इसकी नींव 18 अक्टूबर 1962 को तत्कालीन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद ने रखी थी। आज यह पर्यटकों और इतिहास-प्रेमियों के लिए मुख्य आकर्षण बना हुआ है।
1000 साल पुरानी ब्रह्माजी की दुर्लभ मूर्ति
इस संग्रहालय में 11वीं शताब्दी की प्राचीन ब्रह्माजी की प्रतिमा भी मौजूद है, जिसमें उन्हें सावित्री के साथ आलिंगन अवस्था में दर्शाया गया है। इसे अत्यंत दुर्लभ प्रतिमाओं में गिना जाता है। इसके अलावा अचलगढ़ और देलवाड़ा क्षेत्र से प्राप्त शिव-पार्वती, सूर्य देव, चंवर वाहिनी, विष कन्या और चामुंडा माता की मूर्तियां भी इस क्षेत्र के इतिहास को बयान करती हैं।
स्थानीय निवासी संजय जानी ने बताया कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में एक साथ 999 झालरें बजा करती थीं, जो यहां के मंदिरों और गहरी धार्मिक आस्था का प्रमाण है। चंद्रवती नगरी में हुए उत्खनन कार्य में मिलीं प्राचीन प्रतिमाओं को चंद्रवती और माउंट आबू के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है, जिन्हें देखने देश-विदेश से पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक
संग्रहालय के दूसरे हिस्से में जिले की आदिवासी संस्कृति और रियासतकालीन वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। यहां गरासिया और अन्य आदिवासी समाज के पारंपरिक जीवन को पुतलों, कलाकृतियों और 3डी झोपड़ियों के माध्यम से दिखाया गया है, ताकि उनकी संस्कृति और रहन-सहन को नजदीक से समझा जा सके।
यहां कई प्राचीन वाद्य यंत्र भी रखे गए हैं, जिनमें बारली, दामणी, हाथपॉन और मोरिया जैसे पारंपरिक आभूषण व परिधान शामिल हैं। इसके दूसरे भाग में राजस्थान की विभिन्न चित्रकला शैलियों के साथ-साथ प्राचीन काल के अस्त्र-शस्त्र जैसे धनुष-बाण, धारिया, तलवारें और कटार को भी प्रदर्शित किया गया है।
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