आमतौर पर किसान मौसम के हिसाब से धान, गेहूं और सब्जियों की खेती करते हैं, लेकिन मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड स्थित गोविंदपुर गांव के रहने वाले श्रीकांत कुशवाहा ने खेती का बिल्कुल अलग रास्ता चुना। बीते करीब दो दशकों से वे औषधीय पौधों की खेती में जुटे हैं और आज इस क्षेत्र में एक कामयाब किसान के रूप में उनकी पहचान बन चुकी है।
श्रीकांत ने अपनी 32 कट्ठा जमीन पर 430 से अधिक किस्म के औषधीय पौधे लगाए हैं। यह बगीचा न सिर्फ उनकी कमाई का जरिया है, बल्कि लोगों के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी और जागरूकता का केंद्र भी बन गया है।
कैसे शुरू हुआ यह सफर
श्रीकांत कुशवाहा बताते हैं कि औषधीय पौधों की खेती की ओर उनका झुकाव वर्ष 2002 में पैदा हुआ। एक बार वे पटना के बिहटा गए थे, जहां उन्होंने एक व्यक्ति को जड़ी-बूटियों का कारोबार करते देखा। उसी पल उनके मन में इस क्षेत्र को लेकर दिलचस्पी जगी और उन्होंने आयुर्वेद तथा जड़ी-बूटियों की जानकारी हासिल करने का निश्चय किया।
इसके लिए उन्होंने प्रसिद्ध वैद्य डॉ. श्याम बिहारी तिवारी को अपना गुरु बनाया और उनके मार्गदर्शन में करीब तीन वर्षों तक जड़ी-बूटियों एवं औषधीय पौधों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पौधों की पहचान, उनके औषधीय गुण, अलग-अलग बीमारियों में उनके उपयोग और संरक्षण के तरीकों को गहराई से समझा।
जंगलों से संग्रह और औषधीय उद्यान
प्रशिक्षण पूरा करने के बाद श्रीकांत ने बिहार सहित कई राज्यों के जंगलों और प्राकृतिक इलाकों का भ्रमण किया। वहां से उन्होंने तरह-तरह के दुर्लभ और उपयोगी औषधीय पौधे जुटाए। धीरे-धीरे उनकी जमीन एक औषधीय उद्यान में तब्दील हो गई। आज उनके बगीचे में 430 से अधिक प्रजातियों के औषधीय पौधे मौजूद हैं, जो लोगों को अपनी ओर खींचते हैं।
दूसरे राज्यों तक पौधों की मांग
श्रीकांत कुशवाहा के मुताबिक, उनके यहां तैयार होने वाले पौधों की मांग सिर्फ मुजफ्फरपुर या आसपास के जिलों तक ही सीमित नहीं है। दूसरे राज्यों से भी लोग यहां पौधे खरीदने पहुंचते हैं। नर्सरी के रूप में पौधों की बिक्री से उन्हें सालाना एक लाख रुपये से अधिक की आय होती है। इसके अलावा स्थानीय लोग विभिन्न औषधीय पौधों और घरेलू उपचारों की जानकारी लेने के लिए भी उनके पास आते हैं।
छात्रों और शोधार्थियों के लिए अध्ययन केंद्र
उनका औषधीय गार्डन अब विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भी पढ़ाई-अध्ययन का अहम केंद्र बन चुका है। बीएससी, कृषि और वनस्पति विज्ञान के छात्र यहां भ्रमण के लिए आते हैं और औषधीय पौधों की विशेषताओं, उपयोगिता तथा संरक्षण के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। यहां उन्हें पौधों की खेती की तकनीक और जैव विविधता के महत्व को समझने का मौका भी मिलता है।
आय के साथ पर्यावरण की रक्षा
श्रीकांत कुशवाहा का मानना है कि औषधीय पौधों की खेती सिर्फ कमाई का साधन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा का भी एक असरदार माध्यम है। उनका यह प्रयास आज कई किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।
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