108 दिन तक चले खून-खराबे के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध थम गया है। दोनों देशों के बीच हुए शांति समझौते की लगभग सभी शर्तें अब दुनिया के सामने आ चुकी हैं। बावजूद इसके, कई जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर आखिरकार यही समझौता करना था, तो फिर ईरान के खिलाफ जंग छेड़ने की जरूरत ही क्या थी।
अमेरिका और ईरान एक ऐसे शांति समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसके तहत लेबनान समेत मध्य पूर्व के हर मोर्चे पर लड़ाई फौरन रोकने पर रजामंदी बनी है। समझौते की ज्यादातर शर्तें सार्वजनिक हो चुकी हैं, जिनमें सबसे अहम शर्त ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। साथ ही दुनिया की सप्लाई चेन की सबसे संवेदनशील कड़ी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी तत्काल सबके लिए खोल दिया जाएगा। स्विट्जरलैंड में 19 जून को MoU पर हस्ताक्षर होते ही यह समझौता लागू हो जाएगा। लेकिन विशेषज्ञ इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं कि ओबामा के JCPOA को रद्द करने के बाद आखिर ट्रंप ने ऐसा कौन सा बड़ा दांव खेला है? आइए, ओबामा से लेकर ट्रंप तक ईरान डील का पूरा सफर समझते हैं।
अमेरिका-ईरान डील की कहानी की शुरुआत कहां से हुई?
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 2002 से होती है, जब पहली बार दुनिया को यह जानकारी मिली कि ईरान परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है। अमेरिका को पता चला कि ईरान नतांज और अरक में परमाणु कार्यक्रम चला रहा है, यानी भविष्य में वह परमाणु बम तक पहुंच सकता है। इसके बाद ईरान पर अमेरिका, यूरोप और IAEA का दबाव लगातार बढ़ता गया। 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध थोप दिए। इन प्रतिबंधों के चलते ईरान का तेल और बैंकिंग क्षेत्र गहरे संकट में फंस गया, जिसके बाद ईरान इन पाबंदियों से बचने के रास्ते खोजने में जुट गया।
ओबामा का दौर और 2015 की वह ऐतिहासिक डील
अमेरिका में 2009 में रिपब्लिकन जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बाद डेमोक्रेट बराक ओबामा राष्ट्रपति चुने गए। ओबामा का मानना था कि प्रतिबंध या युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। साल 2012-2013 में ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त बातचीत शुरू हुई। उस समय ईरान में डॉ. हसन रूहानी की सरकार थी और रूहानी भी पश्चिम के साथ किसी समझौते के पक्ष में थे।
दोनों देशों के बीच चल रही इस गुप्त बातचीत ने औपचारिक वार्ता का रास्ता खोल दिया और इसी से JCPOA की जमीन तैयार होने लगी। साल 2013 में दोनों देश एक अंतरिम समझौते तक पहुंचे और इसके बाद करीब दो साल तक अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन और ईरान के बीच बातचीत का दौर चलता रहा। आखिरकार 2015 में JCPOA पर हस्ताक्षर हुए।
JCPOA के अहम बिंदु
- ओबामा ने ईरान के यूरेनियम एनरिचमेंट को 3.67 फीसद तक सीमित कर दिया।
- एनरिच यूरेनियम का भंडार 300 किग्रा तक सीमित किया गया।
- हजारों की संख्या में सेंट्रीफ्यूज हटाए गए।
- IAEA को व्यापक स्तर पर निरीक्षण का अधिकार दिया गया।
- इसके बदले अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र ने ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी।
ट्रंप का पहला कार्यकाल और JCPOA से बाहर निकलना
डेमोक्रेट ओबामा का दूसरा कार्यकाल 2017 में समाप्त हो रहा था। 2016 के अंत में चुनाव प्रचार के दौरान से ही रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ओबामा की इस डील को 'बैड डील' या 'वन साइडेड डील' बताते आ रहे थे। जनवरी 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और अगले ही साल मई 2018 में उन्होंने अमेरिका को JCPOA से बाहर खींच लिया।
ट्रंप ने JCPOA से बाहर निकलने के पीछे क्या तर्क दिए?
ट्रंप का मानना था कि ओबामा की डील में कुछ प्रतिबंध 15 साल बाद खत्म हो जाने थे, यानी यह डील स्थायी नहीं थी। उनका तर्क था कि इससे ईरान भविष्य में दोबारा परमाणु बम बनाने की दिशा में बढ़ सकता है। ट्रंप का कहना था कि ओबामा की डील केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित थी, जबकि वे इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को भी शामिल करना चाहते थे।
ट्रंप का यह भी कहना था कि ओबामा की डील में ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों को शामिल नहीं किया गया था, जिसमें हिजबुल्लाह, हूती और दूसरे शिया मिलीशिया को समर्थन देना आता है। उनका मानना था कि ईरान को प्रतिबंधों से राहत देने का मतलब उसे और मजबूत करना है, जिससे मध्य पूर्व में उसके साथी गुट भी ताकतवर होंगे। ट्रंप यह भी मानते थे कि ईरान पर सख्त प्रतिबंध लगाकर उसे एक बेहतर और व्यापक समझौते के लिए मजबूर किया जा सकता है। इन्हीं सब वजहों से ट्रंप ने ओबामा की 2015 वाली डील को खारिज कर दिया था।
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल
डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार 2025 में सत्ता में लौटे और अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में कामकाज संभाला। इस बार वे 'मागा' के नारे के साथ वापसी कर चुके थे। ईरान के साथ 19 जून को होने वाले शांति समझौते को भी 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के नजरिए से ही पेश किया जा रहा है।
ओबामा बनाम ट्रंप: दो डील, क्या फर्क और कौन बेहतर?
ट्रंप नहीं चाहते कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करे और ईरान ने भी परमाणु बम न बनाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। ट्रंप ने यूरेनियम एनरिचमेंट को लेकर ईरान को बाध्य तो किया है, लेकिन इस पर तस्वीर अभी साफ नहीं है। ट्रंप ने होर्मुज को खोलने का रास्ता तैयार किया है, पर ओबामा के दौर में भी होर्मुज बंद नहीं था।
जानकारों का मानना है कि ओबामा की डील ट्रंप की डील के मुकाबले कहीं ज्यादा स्पष्ट थी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम की निगरानी का बेहतर और व्यापक इंतजाम मौजूद था। ट्रंप ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गुटों के मुद्दे को समझौते में शामिल करने में नाकाम रहे, जबकि इन्हीं मुद्दों को लेकर वे लंबे समय तक ओबामा की आलोचना करते रहे थे। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि जब आखिर में यही समझौता करना था, तो ईरान के साथ जंग करने की जरूरत ही क्या थी।
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