सोशल मीडिया पर बोलने से पहले सोचें! सुप्रीम कोर्ट के वकील ने बताईं अभिव्यक्ति की आजादी की संवैधानिक सीमाएं

वायरल होने की होड़ में की गई एक अभद्र या मानहानिकारक टिप्पणी कानूनी मुसीबत बन सकती है। सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप मिश्रा से जानिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा, रोस्टिंग और मानहानि का फर्क तथा नए आपराधिक कानूनों के प्रावधान।

रातों-रात मशहूर होने की चाह में जुटे लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया पर हर बात कही या लिखी नहीं जा सकती। हमारा संविधान बोलने और लिखने की आजादी जरूर देता है, मगर इसके साथ कुछ बंधन भी जुड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील संदीप मिश्रा ने एक खास बातचीत में समझाया कि वायरल होने का जुनून किस तरह व्यक्ति को जेल की सलाखों तक पहुंचा सकता है और उसकी पढ़ाई-लिखाई को खतरे में डाल सकता है। आइए जानते हैं उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कानूनी दायरे, रोस्टिंग बनाम मानहानि और देश के नए आपराधिक कानूनों को लेकर क्या-क्या कहा।

अभिव्यक्ति की आजादी पूर्ण अधिकार नहीं

एडवोकेट संदीप मिश्रा के अनुसार, संविधान हर नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार देता है, लेकिन इस अधिकार की कुछ मर्यादाएं भी हैं। उन्होंने कहा कि लोग अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला तो देते हैं, पर इसके साथ जुड़े 'रीजनेबल रिस्ट्रिक्शंस' वाले हिस्से को पढ़ना भूल जाते हैं। आजादी जरूर है, लेकिन इस पर पब्लिक ऑर्डर, नैतिकता, स्वास्थ्य, व्यवस्था और दूसरे देशों के साथ हमारे संप्रभु संबंधों के आधार पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

मिश्रा ने कहा, 'आपको कुछ भी कहने या व्यक्त करने का अधिकार है, मगर आप किसी की खिड़की के भीतर नहीं झांक सकते। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने आप में पूर्ण अधिकार नहीं है, इसके साथ निर्बंधन जुड़े हुए हैं।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर किसी के खिलाफ मानहानिकारक शब्द कहे गए हैं, तो वह कानून का सहारा ले सकता है।

डिजिटल युग में सबूत मिटाना मुश्किल

उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर व्यूज से धन तो मिलता है, मगर इसके साथ यह जिम्मेदारी भी आती है कि व्यक्ति सोच-समझकर पोस्ट करे। मिश्रा के मुताबिक यह डिजिटल युग है, जहां गलती करने पर किसी गवाह या सबूत की दरकार नहीं रहती। जांच एजेंसियों को धोखा देने के लिए भले ही कोई कंटेंट एडिट कर ले, पर मूल कंटेंट एजेंसियां अदालत के सामने पेश कर देती हैं। ऐसे में गलत काम ही गले की हड्डी बन जाता है और कोई बचा नहीं पाता।

Gen-Z के लिए लक्ष्मण रेखा

युवाओं और खासकर Gen-Z के लिए सलाह देते हुए मिश्रा ने आत्म-चिंतन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जो बात आप अपने लिए पसंद नहीं करते, वह दूसरे के बारे में कहने से बचें। जैसे कोई नहीं चाहता कि उसके घर की बातें या परिवार की नकारात्मक छवि सार्वजनिक मंच पर रखी जाए, वैसे ही दूसरों की छवि भी धूमिल नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने सीमावर्ती और तटीय राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु और केरल का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के युवाओं की जिम्मेदारी और बड़ी है कि वे ऐसी कोई टिप्पणी न करें जो देश की संप्रभुता या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बने। उनके मुताबिक, अनजाने में की गई पोस्ट का भी विरोधी राष्ट्र दुरुपयोग कर सकते हैं।

मिश्रा ने सबसे बड़ी सावधानी के तौर पर सूचना को वेरिफाई करने की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी भरोसेमंद और जिम्मेदार स्रोत से आई खबर साझा करने में दिक्कत नहीं है, मगर किसी अनजान वेबसाइट या यूट्यूबर के कंटेंट की सत्यता की पुष्टि नहीं होती। जब तक बात पुष्ट न हो जाए, उसे लाइक, शेयर या फॉरवर्ड नहीं करना चाहिए। अगर साझा किए गए कंटेंट में आपराधिक पहलू बनता है, तो पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है।

मजाक में कबूलनामा भी पड़ सकता है भारी

वायरल होने की चाह में मजाक-मजाक में गैरकानूनी काम कबूल करने या अभद्र टिप्पणी करने पर एफआईआर की आशंका को लेकर मिश्रा ने कहा कि जिला अदालत और सीजेएम जैसी निचली अदालतें आमतौर पर स्वतः संज्ञान नहीं लेतीं, क्योंकि उन पर पहले से बहुत काम का बोझ है। हालांकि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास पर्याप्त शक्तियां हैं और वे उनका इस्तेमाल भी करते हैं। उन्होंने कहा कि शिकायत होने पर कार्रवाई जरूर होती है और मुकदमे झेलने पड़ते हैं। यदि डिजिटल सबूत यह साबित कर देता है कि व्यक्ति ने मानहानिकारक शब्द साझा किए हैं, तो कोई बचाव काम नहीं आता।

करियर और पासपोर्ट पर खतरा

अज्ञानतावश हुई गलती और मुकदमे के असर पर मिश्रा ने कहा कि पहली बार जाने-अनजाने हुए अपराध में अदालत का रुख कुछ नरम हो सकता है, लेकिन अगर हिस्ट्री बन जाती है तो बचना मुश्किल है। उन्होंने 'Prevention is better than cure' का सूत्र दोहराते हुए बताया कि मुकदमे के दौरान विदेश यात्रा की अनुमति नहीं मिलती और पासपोर्ट तक जब्त हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी या निजी नौकरी में पुलिस वेरिफिकेशन होता है, और जब तक व्यक्ति मुकदमे से बरी नहीं होता, उसे नौकरी मिलना बहुत कठिन रहता है।

मिश्रा के मुताबिक वायरल होने से दो-चार दिन की प्रसिद्धि भले मिल जाए, मगर जिंदगी में कोई शॉर्टकट नहीं है और मेहनत करनी ही पड़ती है। उन्होंने शुभांशु शुक्ला, मैरी कॉम और वैभव सूर्यवंशी का उदाहरण देते हुए कहा कि शॉर्टकट से वायरल होने के बजाय अपने काम से नाम कमाना चाहिए, ताकि लोग खुद आपके काम को वायरल करें।

अभद्र भाषा से कमाई के भ्रम से बचें

एक ओर मेहनत से नाम कमाने वाले और दूसरी ओर अभद्र भाषा से करोड़ों कमाने वाले इन्फ्लुएंसर्स के बीच युवाओं के भ्रम पर मिश्रा ने कहा कि दूसरों की गलतियों से सबक लेना चाहिए, वरना आपकी गलतियों से लोग सबक लेंगे। उन्होंने कहा कि एक दिन भी जेल जाना पड़े तो आजादी की कीमत समझ आ जाती है, इसलिए ऐसा कुछ न करें जिससे आपकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगे। उनके अनुसार करोड़ों कमाने के बाद भी ऐसे लोगों के पास मन की शांति नहीं होती। उन्होंने आगाह किया कि बहन-बेटियों के खिलाफ बोलने पर पुलिस सख्ती से निपटती है और युवाओं को नकारात्मकता से दूर रहकर अपनी सकारात्मक ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए।

रोस्टिंग और मानहानि के बीच पतली लकीर

सरेआम 'रोस्ट' करने के नए ट्रेंड पर मिश्रा ने कहा कि हास्य और मानहानि के बीच बहुत बारीक लकीर है। अगर कोई बात पहले से सार्वजनिक दायरे में है और उसे 'गुड फेथ' में कहा जा रहा है, तो व्यक्ति बच सकता है। लेकिन किसी की निजी और नकारात्मक जानकारी सार्वजनिक करने पर, जिससे उसकी छवि धूमिल हो, कानून का हथौड़ा गिर सकता है।

उन्होंने बताया कि पीड़ित अपने वकील के जरिये लीगल नोटिस भेजकर कारण पूछ सकता है। अगर सामने वाला बिना शर्त माफी मांग ले तो मामला खत्म हो सकता है, पर अगर वह अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ सिविल या आपराधिक मानहानि का मुकदमा किया जा सकता है।

BNS में सजा के प्रावधान

भारतीय न्याय संहिता को लेकर मिश्रा ने कहा कि BNS में मानहानि का पुराना कानून ही शामिल है और इसमें कोई खास बदलाव नहीं है। सबसे बड़ा बदलाव सबूत दर्ज करने की प्रक्रिया में हुआ है, जो अब डिजिटल हो गई है। इससे मुकदमों की सुनवाई जल्दी होगी और फैसले त्वरित आएंगे, साथ ही मुकदमे को लंबा खींचना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में अधिकतम दो साल की सजा है।

आपराधिक मानहानि के मामलों में मिश्रा ने 'सत्य' को सबसे बड़ा बचाव बताया। उन्होंने कहा कि अगर किसी ने गलती की है और वह अदालत में एफिडेविट देकर बिना शर्त माफी मांग लेता है, तो कई बार अदालतें जुर्माना लगाकर छोड़ देती हैं।

पोस्ट करते समय ये सावधानियां जरूरी

आखिर में मिश्रा ने युवाओं और Gen-Z को कुछ अहम सावधानियां बताईं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के चरित्र या पवित्रता पर कोई टिप्पणी न करें और देश की कोई गोपनीय जानकारी साझा न करें जिसका विदेशी ताकतें फायदा उठा सकें। देश-विरोधी माहौल बनाने वाली आईडी या अकाउंट्स को भारत सरकार के साइबर क्राइम पोर्टल पर रिपोर्ट करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि युवा पहाड़ों पर जा रहे हैं, राफ्टिंग कर रहे हैं और अच्छे काम कर रहे हैं—वे भारत के ब्रांड एंबेसडर हैं। रील बनाने का मकसद देश की खूबसूरती और सकारात्मकता को दुनिया के सामने लाना होना चाहिए। मिश्रा के अनुसार, जब आप सकारात्मक ऊर्जा के साथ काम करेंगे, तो लोग खुद ही आपके काम की सराहना करेंगे।

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