जालोर के किले की दीवारों में सिर्फ पत्थर नहीं जड़े हैं, बल्कि उनमें सदियों पुराना इतिहास आज भी सांस लेता है. इसी इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं जालोर की मशहूर स्वर्ण बावड़ी और झालर-कोलर बावड़ी, जिन्हें आज भी आस्था, रहस्य और चमत्कार से जोड़कर देखा जाता है. यह कहानी महज एक जल संरचना की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब जालोर पर हमला हुआ और अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं ने इस इलाके को घेर लिया था.
लोक मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार, इसी समय राजा वीरमदेव चौहान के जीवन से जुड़ी घटनाएं और उनके परिवार का बलिदान इस क्षेत्र की पहचान बन गया.
दो बहनों की स्मृति से जुड़ी बावड़ियां
इस विषय पर जानकारी देते हुए स्थानीय जानकार बंशीलाल सोनी बताते हैं कि ये दोनों बावड़ियां जालोर की सबसे प्राचीन बावड़ियों में गिनी जाती हैं. उनके मुताबिक, जब जालोर में युद्ध हुआ और अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया, उस समय राजा वीरमदेव की दो बहनें थीं, जिन्होंने इस कठिन घड़ी में सती होकर अपने प्राणों की आहुति दी. माना जाता है कि ये दोनों बावड़ियां उन्हीं की याद में बनवाई गई थीं.
हर बावड़ी के पास एक मंदिर
बंशीलाल सोनी बताते हैं कि इन दोनों बावड़ियों के पास आज भी मंदिर मौजूद हैं, जो इस स्थान को और अधिक पवित्र बना देते हैं. झालर बावड़ी के निकट आशापुरा माता का मंदिर है, जबकि कोलर बावड़ी के पास खेतलाजी क्षेत्रपाल जी का मंदिर स्थित है.
यह परंपरा भी बताती है कि पुराने समय में किसी भी मंदिर के साथ बावड़ी का होना जरूरी माना जाता था, क्योंकि उसी जल से देवताओं को स्नान कराया जाता था और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते थे.
सोने जैसे कणों वाली स्वर्ण बावड़ी
कोलर बावड़ी को लोग आज भी स्वर्ण बावड़ी के नाम से पुकारते हैं. कहा जाता है कि पुराने जमाने में इस बावड़ी के पानी में मिट्टी के साथ-साथ हल्के सोने जैसे कण भी मिलते थे, जिसके कारण इसे बेहद पवित्र और रहस्यमय माना जाने लगा. यही वजह है कि यह स्थान लोगों की आस्था का केंद्र बन गया.
वहीं झालर बावड़ी को लेकर भी कई लोककथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि यहां सती हुई बहन की स्मृति में एक चमत्कारी संकेत दिखाई देता था, जिसे लोग श्रद्धा से पूजते थे. समय के साथ एक घटना में उस प्रतीक को नष्ट कर दिया गया, फिर भी लोगों की आस्था आज तक कम नहीं हुई.
अकाल में भी कभी नहीं सूखा पानी
एक और अहम मान्यता यह है कि इन बावड़ियों का पानी कभी नहीं सूखता. कितना भी भयंकर अकाल क्यों न पड़ा हो, इन जल स्रोतों ने हमेशा जालोर की धरती को जीवन दिया है. पुराने समय में तो इसी पानी से जालोर दुर्ग पर खेती तक की जाती थी, जिससे किले में रहने वाले लोगों का जीवन-यापन संभव हो पाता था.
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जब पूरे इलाके में भयंकर सूखा और अकाल पड़ा, तब भी जालोर की ये दोनों बावड़ियां लोगों के लिए जीवन का सहारा बनी रहीं. कहा जाता है कि संवत 1925 और 1856 के बीच जब जालोर में बड़े अकाल पड़े, उस समय चारों ओर पानी की भारी कमी थी, मगर इसके बावजूद इन बावड़ियों का जल कभी खत्म नहीं हुआ.
त्याग और आस्था की जीवंत विरासत
आज स्वर्ण, झालर और कोलर बावड़ी केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि ये उस इतिहास की गवाह हैं जहां त्याग, आस्था और जीवन एक साथ जुड़े हुए थे. यह स्थान आज भी लोगों को यह अहसास कराता है कि जालोर की धरती सिर्फ युद्धों की नहीं, बल्कि अमर कहानियों की भूमि है.
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