मानसून का अनोखा 'मौसम वैज्ञानिक': पेड़ पर कभी न बैठने वाली टिटहरी कैसे देती है बारिश का संकेत

ग्रामीण मान्यता के अनुसार टिटहरी पक्षी अपने अंडों की संख्या और उन्हें रखने की जगह से मानसून का अंदाजा देता है, जबकि विशेषज्ञ इसे लोककथा मानते हुए मानते हैं कि यह पक्षी जरूर पानी के स्रोत का संकेत देता है।

मानसून का मौसम शुरू होते ही गांव-देहात में सबसे ज्यादा चर्चा टिटहरी पक्षी की होने लगती है। मौसम विभाग के पूर्वानुमानों से पहले लोग इसी पक्षी के अंडों को देखकर अंदाजा लगाते थे कि आने वाला बारिश का मौसम कैसा रहेगा। लेकिन टिटहरी की पहचान सिर्फ उसके अंडों तक सीमित नहीं है। यह पानी के स्रोत का संकेत देती है और इंसानों की तरह अपने बच्चों की देखभाल भी करती है।

ग्रामीण इलाकों में यह भी माना जाता है कि पंख होने के बावजूद यह पक्षी हमेशा जमीन से जुड़ा रहता है। इसे कभी किसी पेड़ पर बैठे नहीं देखा जाता। ऐसे में टिटहरी के अंडों से मानसून के अनुमान और इसके पेड़ पर न बैठने को लेकर लोककथाएं क्या कहती हैं और इस पर विज्ञान का क्या नजरिया है, यह जानने के लिए बुजुर्गों और जानकारों से बात की गई।

बुजुर्गों की मान्यता और अंडों का गणित

सागर जिले की रहली के रहने वाले 90 वर्षीय जीवन लाल उपाध्याय बताते हैं कि अपने इतने लंबे जीवनकाल में उन्होंने टिटहरी को कभी पेड़ पर बैठे नहीं देखा। वे कहते हैं कि बुजुर्गों से भी यही सुनते आए हैं कि यह पक्षी कभी पेड़ पर नहीं बैठता, या तो आसमान में उड़ता रहता है या जमीन पर चलता है।

उनके अनुसार जब टिटहरी अंडे देती है और लोग उन्हें बिखेर देते हैं, तो उसके बाद यह पक्षी दोबारा जितने अंडे एकत्रित करती है, उतने ही महीने पानी गिरने का अनुमान लगाया जाता है। जैसे चार अंडों में से अगर उसने तीन अंडे एकत्रित किए, तो माना जाता है कि उस साल तीन महीने ही बारिश होगी।

वे आगे बताते हैं कि अगर टिटहरी ने अपने अंडे नदी में रख दिए हैं, तो जब तक उनमें से बच्चे नहीं निकल आते, तब तक नदी की धार नहीं निकल सकती। यानी उस साल कम बारिश होगी, या फिर चूजे निकलने के बाद ही बारिश शुरू होगी—ऐसी मान्यता लोगों के बीच प्रचलित है।

किसानों का दोस्त क्यों कहलाती है टिटहरी

इस पक्षी को किसानों का दोस्त भी कहा जाता है, क्योंकि यह खेतों में पाए जाने वाले कीट-पतंगों को अपने आहार के रूप में खाती है। अक्सर जब खेतों में जुताई या बुवाई होती है, तब इसे ट्रैक्टर या बैलगाड़ी के पीछे मिट्टी से निकलने वाले कीड़ों को खाते हुए देखा जाता है।

क्या कहता है विज्ञान

सागर के बांदरी महाविद्यालय के जूलॉजी विभाग में अतिथि विद्वान डॉ. मनीष जैन कहते हैं कि टिटहरी से जुड़ी लोककथाएं ग्रामीण अंचलों में बहुत प्रचलित हैं, लेकिन इनके पीछे कोई स्पष्ट वैज्ञानिक तथ्य नहीं है। उनके मुताबिक किसी भी शोध में यह प्रमाणित नहीं हुआ है कि टिटहरी के अंडों की संख्या के आधार पर यह तय किया जा सके कि जितने अंडे होंगे, उतने महीने पानी गिरेगा।

हालांकि वे यह जरूर मानते हैं कि जहां टिटहरी मौजूद होती है, वहां आसपास पानी का स्रोत अवश्य होता है। डॉ. जैन बताते हैं कि टिटहरी सामान्य तौर पर अपने अंडे जमीन पर ही देती है और नर तथा मादा दोनों मिलकर समय-समय पर उन अंडों की देखभाल करते हैं।

उनके अनुसार टिटहरी के पानी का स्रोत बताने के पीछे यही कारण है कि यह जहां भी रहती है और अंडे देती है, वह नमी वाला इलाका होता है, ताकि वह अपने बच्चों के साथ-साथ खुद भी छोटे-छोटे जीव-जंतुओं को आहार बनाकर अपना जीवन-यापन कर सके।

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