आज के दौर में खेती के साथ-साथ मछली पालन भी किसानों के लिए आमदनी का बेहतर जरिया बनता जा रहा है। खास बात यह है कि बायोफ्लॉक तकनीक के सहारे अब घर के आसपास सीमित जगह में भी बड़े पैमाने पर मछली पालन किया जा सकता है, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा मिल रहा है।
दो तरीकों से हो रहा है मछली पालन
मछली पालन विभाग के सहायक संचालक मत्स्य दीपक शुक्ला के अनुसार, इस समय जिले में मुख्य रूप से दो तरीकों से मछली पालन किया जा रहा है। पहला है पारंपरिक तालाब आधारित मछली पालन और दूसरा है आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक।
पारंपरिक पद्धति में बड़े तालाब और ज्यादा जमीन की आवश्यकता होती है, जबकि बायोफ्लॉक तकनीक में छोटे टैंकों के जरिए भी आसानी से मछली पालन किया जा सकता है। यही वजह है कि कम जगह वाले किसानों के लिए यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो रही है।
तिलापिया मछली का होता है पालन
बायोफ्लॉक तकनीक में मुख्य रूप से तिलापिया मछली पाली जाती है। इस मछली का ग्रोथ रेट यानी विकास दर काफी तेज होती है, जिससे कम समय में ही अच्छा वजन तैयार हो जाता है। यही कारण है कि किसान जल्दी उत्पादन लेकर बाजार में अपनी मछली बेच पाते हैं।
एक टैंक में कितनी मछलियां
विभाग की जानकारी के मुताबिक, 2 घन मीटर के एक बायोफ्लॉक टैंक में एक बार में 400 से 500 मछलियां तैयार की जा सकती हैं। इन मछलियों का वजन करीब 1 से डेढ़ किलो तक पहुंच जाता है। बाजार में इनकी कीमत 150 से 200 रुपए प्रति किलो तक मिल जाती है।
हर साल लाखों की कमाई संभव
तेज विकास दर और अच्छी बाजार कीमत के चलते किसान साल में दो बार उत्पादन ले सकते हैं। इस तरह बायोफ्लॉक तकनीक को अपनाकर किसान सालभर में करीब 4 से 5 लाख रुपए तक की कमाई कर सकते हैं, वह भी अपेक्षाकृत कम लागत में।
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