बरसात का मौसम गन्ना किसानों के लिए चुनौती भरा होता है। इन दिनों फसल पर कई ऐसे खतरे मंडराने लगते हैं, जो पूरी पैदावार को चौपट कर सकते हैं। इनमें लाल सड़न, पोकाबोइंग और तना छेदक जैसी बीमारियों का जोखिम सबसे ज्यादा रहता है। बिहार का पश्चिम चम्पारण ज़िला गन्ने की खेती का प्रमुख बेल्ट माना जाता है, इसलिए यहां के अधिकतर किसान इन रोगों को लेकर लगातार चिंतित रहते हैं।
सही देखभाल से सुरक्षित रहेगी फसल
बरसात के दौरान थोड़ी सावधानी और सही रख-रखाव अपनाकर गन्ने की फसल को फंगस समेत कई बीमारियों से बचाया जा सकता है। उचित देखभाल न सिर्फ फसल को स्वस्थ रखती है, बल्कि उसे हरा-भरा और लहलहाता हुआ भी बनाए रखती है।
टॉप ड्रेसिंग के लिए सबसे उपयुक्त समय
ज़िले के माधोपुर स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में कार्यरत गन्ना वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण बताते हैं कि देर से बोई गई बसंतकालीन गन्ने की फसल की तेज़ बढ़त के लिए यह टॉप ड्रेसिंग का बेहतरीन समय है। उनके अनुसार किसानों को बुवाई के बाद यूरिया की आधी मात्रा यानी 40 से 45 किग्रा प्रति एकड़ की दर से खड़ी फसल में टॉप ड्रेसिंग करनी चाहिए।
संतुलित उर्वरक और जलनिकासी जरूरी
जिन किसानों ने यूरिया की टॉप ड्रेसिंग कर ली है, वे पानी में घुलनशील उर्वरक 18:18:18 को 2 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करें। ध्यान रहे कि गन्ने में हमेशा संतुलित उर्वरकों का ही इस्तेमाल किया जाए। साथ ही जिन खेतों में जलजमाव की स्थिति बने, वहां पानी की निकासी की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करनी चाहिए।
जलजमाव से बचाव और मिट्टी चढ़ाना
डॉ. सतीश के मुताबिक खेत में ज्यादा पानी जमा होने से फसल के सड़ने की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए निचले इलाकों में स्थित खेतों में नालियों का इंतज़ाम जरूर होना चाहिए। इसके अलावा जुलाई के महीने में फसल में मिट्टी चढ़ाना उसकी मजबूती के लिहाज से उपयुक्त माना जाता है। दरअसल बरसात के कारण मिट्टी मुलायम हो जाती है, जिससे पौधों की पकड़ कमज़ोर पड़ जाती है। ऐसे में किसानों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।
रोग दिखते ही करें कॉपर ऑक्सी क्लोराइड का छिड़काव
लाल सड़न, पोक्कहा बोइंग और फंगस आदि के लक्षण नज़र आते ही कॉपर ऑक्सी क्लोराइड को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करना चाहिए। इससे रोग के खत्म होने की संभावना बढ़ जाती है और फसल की सेहत भी बेहतर बनी रहती है। नतीजतन बंपर पैदावार मिलती है और किसानों को इस पर ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ता।
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