असम के जोरहाट एयरफोर्स स्टेशन पर लैंडिंग के समय भारतीय वायुसेना का AN-32 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में वायुसेना के पांच जांबाज शहीद हो गए। शहीद होने वालों में स्क्वाड्रन लीडर प्रशांत सिंह, फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार, सार्जेंट जितेंद्र शर्मा, अग्निवीर वायु खेमाराम कुमावत और दानिश आलम शामिल हैं। इस घटना के बाद एक बार फिर उन वजहों पर चर्चा तेज हो गई है, जिनके चलते मिशन के दौरान विमान हादसों का शिकार हो रहे हैं।
वायुसेना में एयर मार्शल रह चुके एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि AN-32 विमान पिछले चार दशकों से भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट बेड़े की रीढ़ रहा है। 1980 के दशक के मध्य में सेवा में शामिल हुआ यह विमान तब से अब तक लद्दाख, पूर्वोत्तर भारत और अंडमान-निकोबार समेत देश के कई हिस्सों में अपने अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम देता आया है। जोरहाट में भी इस विमान ने अलग-अलग ऑपरेशनों को कामयाबी से पूरा किया है।
हादसे के पीछे क्या हो सकते हैं कारण
पूर्व एयर मार्शल के मुताबिक किसी भी उड़ान के दो सबसे अहम चरण टेकऑफ और लैंडिंग होते हैं। दुनिया भर में करीब 90 प्रतिशत विमान हादसे इन्हीं दो चरणों के दौरान होते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि टेकऑफ और लैंडिंग के समय विमान अपनी परफॉर्मेंस क्षमता की सीमा के बेहद नजदीक काम कर रहा होता है। उस वक्त विमान की रफ्तार कम होती है और पायलट को बेहद सीमित समय में कई अहम फैसले लेने पड़ते हैं।
उनका कहना है कि लैंडिंग के दौरान अगर कोई गंभीर तकनीकी खराबी, आपात स्थिति या नियंत्रण से जुड़ी कोई दिक्कत आ जाए तो पायलट के पास प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय बचता है। जमीन के करीब होने और रफ्तार कम रहने के कारण दुर्घटना का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
पूर्वोत्तर में उड़ान भरना आम बात नहीं
पूर्व एयर मार्शल के अनुसार जोरहाट समेत पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में उड़ान भरना किसी सामान्य विमान ऑपरेशन जैसा नहीं होता। सैन्य और वाणिज्यिक उड़ानों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि सैन्य विमान उन इलाकों में जाते हैं, जहां सामान्य यात्री विमान नहीं पहुंचते। AN-32 जैसे विमान घाटियों, पहाड़ों और दुर्गम क्षेत्रों में उड़ान भरते हैं, जहां कई बार रडार कवरेज भी नहीं होता।
उनका कहना है कि मौसम के तेजी से बदलने, बादल छाने, बारिश होने या विजिबिलिटी कम होने पर उड़ान संचालन बेहद मुश्किल हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पायलटों को संकरी घाटियों के बीच से होते हुए छोटे एयरस्ट्रिप तक पहुंचना पड़ता है। कई जगह तो रनवे पूरी तरह विकसित भी नहीं होते। यही कारण है कि इस तरह के मिशन बेहद चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं।
छोटी चूक भी बन सकती है बड़ा खतरा
पूर्व एयर मार्शल बताते हैं कि पूर्वोत्तर और पहाड़ी इलाकों में मौजूद कई एयरस्ट्रिप सिर्फ 3,000 से 3,500 फीट लंबे होते हैं। कुछ जगहों पर तो विमान को केवल एक ही दिशा से उतारा जा सकता है। ऐसे में पायलट के पास गलती सुधारने की गुंजाइश बहुत कम होती है।
उनके मुताबिक अगर विमान तय लैंडिंग प्वाइंट से आगे उतरता है तो रनवे की लंबाई कम पड़ सकती है, वहीं अगर वह तय स्थान से पहले नीचे आ जाए तो पेड़ों और पहाड़ियों से टकराने का खतरा पैदा हो जाता है। यही वजह है कि इन इलाकों में लैंडिंग को बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
बादल और घाटियां भी पैदा करती हैं जोखिम
पुराने हादसों का जिक्र करते हुए पूर्व एयर मार्शल ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में खराब मौसम और घने बादलों के बीच उड़ान भरना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। कई बार विजिबिलिटी इतनी घट जाती है कि घाटियों की पहचान करना तक मुश्किल हो जाता है। कुछ पुराने मामलों में विमान गलत घाटी में दाखिल हो गए थे।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि पायलटों को ऐसी स्थितियों से निकलने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें उन सुरक्षित रास्तों की जानकारी दी जाती है, जहां से सुरक्षित बाहर निकला जा सके। लेकिन कुछ घाटियां ऐसी भी होती हैं, जहां गलती की गुंजाइश बिल्कुल नहीं होती।
कितना सुरक्षित है वायुसेना का AN-32
पूर्व एयर मार्शल का मानना है कि सिर्फ हादसों के आधार पर AN-32 को असुरक्षित विमान नहीं कहा जा सकता। यह विमान वर्षों से भारतीय वायुसेना के सबसे भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट विमानों में गिना जाता रहा है। इसका इस्तेमाल जवानों और हथियारों के साथ-साथ राशन, दवाइयों और अन्य जरूरी सामग्री को दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने में होता आया है।
इसके अलावा यह विमान पैरा-असॉल्ट मिशन और सर्च एंड रेस्क्यू समेत कई दूसरे अभियानों में भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। समय के साथ इन विमानों को आधुनिक उपकरणों और नए एवियोनिक्स सिस्टम से भी लैस किया गया है।
जोरहाट हादसे की असली वजह कब चलेगी पता
फिलहाल जोरहाट में हुए AN-32 हादसे की असली वजह जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकेगी। वायुसेना समेत संबंधित एजेंसियों के अधिकारी क्रैश साइट पर पहुंच चुके हैं और मलबे से विमान का ब्लैक बॉक्स खोजने की कवायद शुरू कर दी गई है। साथ ही विमान के मलबे के नमूने भी इकट्ठा किए जा रहे हैं। जल्द ही पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल सेंटर के बीच हुई बातचीत की भी पड़ताल की जाएगी। इन सभी पहलुओं की जांच के बाद ही हादसे के कारणों का खुलासा हो सकेगा।
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