अंबाला एसडी कॉलेज का 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल, वर्मी कंपोस्ट के साथ जल और ऊर्जा की बचत भी

अंबाला के सनातन धर्म कॉलेज ने मंदिरों और परिसर के जैविक कचरे को वर्मी कंपोस्ट खाद में बदलने के साथ-साथ वर्षा जल संरक्षण और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देकर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का संदेश दिया है। यह खाद लोगों को निशुल्क भी उपलब्ध कराई जा रही है।

बढ़ते प्रदूषण, घटते जल संसाधनों और ऊर्जा संकट के इस दौर में अंबाला का सनातन धर्म कॉलेज 'वेस्ट टू वेल्थ' की सोच को सही मायनों में जमीन पर उतार रहा है। कॉलेज एक ओर मंदिरों और अपने परिसर से निकलने वाले फूल-पत्तों और जैविक कचरे को वर्मी कंपोस्ट खाद में बदल रहा है, तो दूसरी ओर वर्षा जल संरक्षण और सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के जरिए प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का संदेश भी दे रहा है।

कॉलेज की यह पहल अब आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी प्रेरणा बनती जा रही है। परिसर में स्थापित 18 वर्मी कंपोस्ट यूनिटों में पेड़-पौधों की सूखी पत्तियां, मंदिरों में चढ़ाए गए फूल, नारियल, फल-सब्जियों के छिलके और अन्य जैविक सामग्री को इकट्ठा कर प्राकृतिक खाद तैयार की जा रही है।

केंचुओं की मदद से बनती है उच्च गुणवत्ता वाली खाद

इस पूरी प्रक्रिया में केंचुओं की मदद से जैविक कचरे को उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदला जाता है। खास तौर पर तैयार की गई यह खाद कॉलेज के बगीचे में इस्तेमाल होती है, जबकि बड़ी संख्या में लोग इसे निशुल्क लेने के लिए भी कॉलेज पहुंचते हैं।

पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा का माध्यम

एसडी कॉलेज की प्राचार्य अलका शर्मा ने बताया कि वर्मी कंपोस्ट परियोजना केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा का भी एक जरिया है। उन्होंने कहा कि कॉलेज के विद्यार्थी और स्टाफ मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं, ताकि लोगों तक यह संदेश पहुंचाया जा सके कि घरों और धार्मिक स्थलों से निकलने वाला जैविक कचरा भी एक उपयोगी संसाधन बन सकता है।

प्राचार्य ने बताया कि कॉलेज में पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। विभिन्न कार्यक्रमों में भी ऐसी सामग्रियों का ही उपयोग किया जाता है जो प्रकृति के अनुकूल हों। यहां तक कि मुख्य अतिथियों को भेंट किए जाने वाले फ्लावर पॉट भी प्राकृतिक और उपयोग योग्य सामग्री से तैयार किए जाते हैं।

छतों के वर्षा जल को सहेजते हैं विशेष टैंक

अलका शर्मा के अनुसार, जल संरक्षण की दिशा में भी कॉलेज ने अहम कदम उठाए हैं। परिसर की इमारतों की छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइपलाइन के जरिए विशेष टैंकों में इकट्ठा किया जाता है। इसके लिए कॉलेज में 18 रेन वाटर हार्वेस्टिंग यूनिट स्थापित की गई हैं, जिनमें बारिश का पानी जमा होकर सुरक्षित रहता है।

बाद में इस पानी का उपयोग बागवानी, पौधों की सिंचाई और अन्य जरूरी कामों में किया जाता है। प्राचार्य ने बताया कि इस तरीके से भूजल पर निर्भरता घटने के साथ-साथ पानी की बचत भी सुनिश्चित हो रही है।

ऊर्जा संरक्षण के लिए लगाए गए सोलर पैनल

ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए कॉलेज परिसर की इमारतों की छतों पर सोलर पैनल भी लगाए गए हैं। इन पैनलों से बनने वाली बिजली का इस्तेमाल कॉलेज के रोजमर्रा के कामों में होता है। इससे बिजली के खर्च में कमी आने के साथ-साथ स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।

घरों में भी तैयार हो सकती है प्राकृतिक खाद

प्राचार्य अलका शर्मा का कहना है कि अगर लोग अपने घरों में रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे, पूजा के फूलों और पत्तियों का सही तरीके से उपयोग करें, तो आसानी से प्राकृतिक खाद तैयार की जा सकती है। इससे न केवल कचरा कम होगा, बल्कि बागवानी और पौधों की बेहतर वृद्धि में भी मदद मिलेगी।

उन्होंने बताया कि बाहर से लोग खाद लेने के लिए लगातार कॉलेज आते रहते हैं और इस तरह कॉलेज अंबाला में वर्मी कंपोस्ट खाद निशुल्क उपलब्ध कराने का काम कर रहा है।

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