मालवा की चर्चा होते ही महान शासक अहिल्याबाई होलकर का नाम सामने आता है, जिनके बनवाए मंदिर, बावड़ियां और तालाब आज भी प्रसिद्ध हैं। लेकिन इतिहास में एक और प्रतापी राजा का जिक्र मिलता है, जिन्होंने सदियों पहले जल संरक्षण की ऐसी मिसाल कायम की कि लोग आज भी हैरान रह जाते हैं। यह नाम है परमार वंश के शासक राजा मुंज का, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने भी अपने राज्य में कई मंदिरों के साथ-साथ बावड़ियों और तालाबों का निर्माण कराया था।
चोली गांव में मौजूद विशाल तालाब भी उन्हीं में से एक माना जाता है और यह पूरे क्षेत्र की धरोहर है। करीब एक हजार साल पुराना यह तालाब आज भी साल भर पानी से भरा रहता है। यह न सिर्फ गांव की प्यास बुझाता है, बल्कि आसपास के कई गांवों के खेतों की सिंचाई भी करता है। इसकी विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां तक नजर जाती है, वहां केवल पानी ही पानी दिखाई देता है।
कहां स्थित है यह ऐतिहासिक तालाब
यह प्राचीन तालाब खरगोन जिले के चोली गांव में स्थित है, जो धार्मिक और पर्यटन नगरी महेश्वर से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है। गांव में परमारकालीन कई प्राचीन मंदिर भी मौजूद हैं, जिनमें प्रसिद्ध गौरी सोमनाथ मंदिर भी शामिल है। पुरातत्व विभाग इसे संरक्षित स्मारक मानता है। इसी मंदिर के ठीक सामने यह विशाल तालाब बना हुआ है।
राजा भोज के काका थे राजा मुंज
इतिहास के जानकार नवीन कुमार के अनुसार, सीताराम साधौ द्वारा संपादित पुस्तक 'माहिष्मति स्मारिका' में लेखक प्रह्लाद सिंह यादव ने इस तालाब का उल्लेख किया है। इसमें बताया गया है कि परमार राजवंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज प्रथम के काका राजा मुंज ने इस तालाब का निर्माण कराया था।
उन्होंने बताया कि कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजा मुंज ने 972 ईस्वी से 990 ईस्वी तक, जबकि कुछ के अनुसार 978 ईस्वी से 1021 ईस्वी तक मालवा पर शासन किया। इस दौरान उन्होंने अपनी राजधानी मांडू सहित कई स्थानों पर मंदिर, तालाब और बावड़ियों का निर्माण कराया था।
मांडू का प्रसिद्ध 'मूंज तालाब' भी इन्हीं के नाम
इतिहासकारों के मुताबिक, मांडू में दो तालाबों के बीच बने प्रसिद्ध जहाज महल के पूर्वी भाग में स्थित तालाब को आज भी 'मूंज तालाब' के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि जिस काल में मूंज तालाब बना, उसी दौर में चोली का यह विशाल तालाब भी बनाया गया होगा, क्योंकि इस गांव के मंदिरों का निर्माण भी राजा भोज के कार्यकाल में होना बताया जाता है।
123 एकड़ में फैला है तालाब
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार चोली का यह ऐतिहासिक तालाब करीब 123 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। तालाब की दक्षिण दिशा में पत्थरों की विशाल दीवार बनाई गई थी, जिस पर अद्भुत नक्काशी की गई थी। हालांकि, देखरेख के अभाव में दीवार का बड़ा हिस्सा टूट चुका है, जिसके चलते अब वह प्राचीन कारीगरी दिखाई नहीं देती। फिर भी तालाब की बनावट और इसकी संरचना देखकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं। हजार साल पहले बिना आधुनिक तकनीक के इतने वैज्ञानिक तरीके से जल संरचना तैयार करना किसी अजूबे से कम नहीं माना जाता।
वैज्ञानिक तरीके से हुआ था निर्माण
नवीन कुमार के मुताबिक, इस तालाब की सबसे बड़ी खासियत इसकी बनावट है। विंध्याचल पर्वत से निकलने वाली एक गुमनाम पहाड़ी नदी को तालाब से जोड़ा गया था और उसी नदी का पानी तालाब को भरता है। जब तालाब पूरी तरह भर जाता है, तो अतिरिक्त पानी वेस्टेज वॉल के जरिए करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित मंडलेश्वर तालाब तक पहुंचता है।
इसके बाद बचा हुआ पानी नालों के जरिए बहते हुए अंत में नर्मदा नदी में जाकर मिल जाता है। इन दोनों तालाबों के आपस में जुड़ने के कारण वह पहाड़ी नदी भी नर्मदा से जा मिली।
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