फिल्मी पर्दे की चमक-दमक के पीछे कई बार ऐसे संघर्ष छिपे होते हैं, जिनके बारे में दर्शक कम ही जानते हैं। सोशियोलॉजी की पढ़ाई करने वाली एक साधारण लड़की ने जब ग्लैमर की दुनिया का रुख किया तो उसका खुले दिल से स्वागत नहीं हुआ। कभी उसके चेहरे-मोहरे पर सवाल उठाए गए तो कभी उसके वजन को लेकर भद्दे ताने मारे गए। उसे बार-बार ठुकराया गया और यहां तक कह दिया गया कि वह हीरोइन बनने के लायक ही नहीं है।
लगातार मिलती नाकामियों ने उसके आत्मविश्वास को जरूर हिलाया, मगर उसने अपने सपनों का दामन नहीं छोड़ा। संघर्ष के बीच उसने खुद को साबित करने की ठानी और एक दिन ऐसा भी आया जब उसी अभिनेत्री के अभिनय का पूरा देश कायल हो गया।
ग्लैमर को कामयाबी की पहली शर्त मानने वाली सोच को दी चुनौती
बॉलीवुड में अकसर खूबसूरती और ग्लैमर को सफलता की पहली कसौटी माना जाता है। लेकिन इंडस्ट्री में कुछ कलाकार ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने इस धारणा को गलत साबित कर दिखाया। एक ऐसी ही अभिनेत्री, जिसे करियर की शुरुआत में सिर्फ रिजेक्शन ही हाथ लगा, उसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर अपनी नई पहचान गढ़ी। पर यह सफर बिलकुल आसान नहीं रहा—उसे लोगों के ताने सुनने पड़े, बार-बार ठुकराया गया और 'आईने में अपना चेहरा देखा है' जैसी बातें तक कही गईं।
13 फिल्मों से बाहर, 'मनहूस' का तमगा और सर्जरी तक का दबाव
इस अभिनेत्री को 13 फिल्मों से निकाल दिया गया, 'मनहूस' तक कहा गया, नाक का ऑपरेशन कराने का दबाव डाला गया और वजन को लेकर भद्दे कमेंट्स झेलने पड़े। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। यह अभिनेत्री और कोई नहीं, बल्कि अपनी 'कहानी' खुद लिखने वाली विद्या बालन हैं।
पढ़ाई में अव्वल, सेंट जेवियर्स से सोशियोलॉजी की डिग्री
1 जनवरी 1979 को मुंबई के एक तमिल परिवार में जन्मीं विद्या बालन बचपन से ही पढ़ाई में बेहद तेज थीं। उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेज से सोशियोलॉजी में स्नातक की डिग्री हासिल की। अभिनय के प्रति जुनून रखने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ा और बाद में मुंबई यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री भी पूरी की।
'हम पांच' की राधिका से मिली पहली पहचान
कॉलेज के दिनों में ही विद्या ने टेलीविजन विज्ञापनों और म्यूजिक वीडियो में काम करना शुरू कर दिया था। इसी दौरान उन्हें मशहूर टीवी शो 'हम पांच' में राधिका का किरदार निभाने का मौका मिला, जिसने पहली बार उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। टेलीविजन के बाद विद्या ने बड़े पर्दे की ओर कदम बढ़ाया। उन्हें लगा था कि टीवी के बाद यह राह आसान होगी, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ।
लगातार 12 फिल्मों से रिजेक्शन और बॉडी शेमिंग
साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में कई प्रोजेक्ट साइन करने के बाद भी उन्हें ऐन वक्त पर बाहर कर दिया गया। एक दौर ऐसा भी आया जब उन्हें लगातार 12 फिल्मों से रिजेक्ट कर दिया गया। कुछ निर्देशकों और निर्माताओं ने उनके शरीर को लेकर तीखी आलोचना की।
विद्या अपने पुराने इंटरव्यू में इस बारे में बात कर चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि एक प्रोड्यूसर ने उनके मुंह पर सीधे कह दिया था कि 'तुम में हीरोइन बनने वाले लुक्स नहीं हैं।' यह सब सुनने के बाद वह महीनों तक शीशे में अपना चेहरा देखने से भी कतराने लगी थीं।
'परिणीता' से बदली जिंदगी
लेकिन विद्या ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने खुद को साबित करने की ठानी और लगातार ऑडिशन देती रहीं। आखिरकार साल 2005 में उन्हें वह मौका मिला, जिसने उनकी जिंदगी ही बदल दी। 'परिणीता' फिल्म आई, जिसमें उन्होंने 'ललिता' का किरदार निभाया। अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के दम पर इस फिल्म को शानदार प्रतिक्रिया मिली और विद्या रातों-रात चर्चा में आ गईं।
आलोचकों को जवाब देने वाला राष्ट्रीय पुरस्कार
अपने दमदार, निडर और बेबाक अभिनय के लिए उन्हें साल 2011 का बेस्ट एक्ट्रेस का 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' मिला। यह उन तमाम आलोचकों के मुंह पर करारा तमाचा था, जिन्होंने कभी उनके लुक्स को आधार बनाकर उन्हें नकार दिया था। इसके बाद 'कहानी', 'बॉबी जासूस', 'तुम्हारी सुलु' और 'मिशन मंगल' जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया कि वह अकेले अपने कंधों पर पूरी फिल्म खींच सकती हैं। उनकी फिल्मों में महिलाओं को महज सजावट के तौर पर नहीं, बल्कि कहानी की केंद्रीय ताकत के रूप में पेश किया गया।
अपनी शर्तों पर बनाई पहचान
विद्या की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने ग्लैमर की दौड़ में खुद को बदलने की कभी कोशिश नहीं की। उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर काम किया और वही किरदार चुने, जिनमें अभिनय की पूरी गुंजाइश हो। यही वजह है कि उन्हें कई फिल्मफेयर पुरस्कारों समेत अनेक सम्मान मिले।
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