तृणमूल कांग्रेस के दो बागी सांसदों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने पार्टी के एक अलग संसदीय गुट को समर्थन देने और चुनाव चिह्न पर दावा जताने वाले एक पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। दोनों ने यह भी बताया कि यह चिट्ठी लोकसभा अध्यक्ष को भेजी जा चुकी है। हालांकि स्पीकर कार्यालय की ओर से अब तक ऐसी किसी चिट्ठी के मिलने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शुक्रवार के घटनाक्रम से साफ़ है कि तृणमूल में बिखराव की प्रक्रिया रफ़्तार पकड़ चुकी है। बागी खेमा ख़ुद को असली टीएमसी के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिश में जुटा है, हालांकि इसके लिए ज़रूरी संख्या बल का होना आवश्यक है।
पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले सांसदों की कुल संख्या पर किसी ने खुलकर कुछ नहीं कहा। बागी गुट की नेता काकोली दस्तीदार के अनुसार, "हां, मैंने चिट्ठी पर दस्तख़त किए हैं और हमने इसे काफ़ी समय पहले ही स्पीकर को भेज दिया था।" वहीं टीएमसी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया का कहना है कि इस पत्र से "यह साफ़ हो जाता है" कि "लोकसभा में हम ही असली टीएमसी हैं।"
कौन है वह 20वां बागी सांसद
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, बागी सांसदों के हस्ताक्षर वाला यह पत्र 18 मई का है और इस पर 19 सांसदों के दस्तख़त नज़र आ रहे हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि हस्ताक्षर करने वालों के सीरियल नंबर 1 से 20 तक हैं, मगर नंबर 13 के सामने कोई दस्तख़त नहीं है। इसी ख़ाली जगह ने अटकलों को हवा दे दी है कि कई बार सांसद रह चुके कोई वरिष्ठ नेता बागी खेमे के 20वें सदस्य हो सकते हैं।
प्रक्रिया के तहत आगे स्पीकर ही यह तय करेंगे कि बागी गुट को असली टीएमसी के रूप में मान्यता दी जाए या नहीं, और इसमें आमने-सामने की बैठक भी शामिल होगी। लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं, जिनमें डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी भी हैं, जो पार्टी सुप्रीमो एवं पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे हैं। बागी खेमे की निगाहें अब उन्हीं पर टिकी हुई हैं।
सूत्रों का कहना है, "स्पीकर अपना फ़ैसला चिट्ठी और उस पर हुए दस्तख़तों की असलियत की जांच के बाद सुनाएंगे। फ़िलहाल इन सांसदों ने केवल यही संकेत दिया है कि वे एक अलग संसदीय समूह के रूप में पहचाने जाना चाहते हैं। ऐसा कोई संकेत सामने नहीं आया कि वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना चाहते हैं, हालांकि बागी गुट की नेता काकोली दस्तीदार यह कह चुकी हैं कि वे एनडीए का समर्थन करना चाहती हैं।"
पत्र पर किन-किन के हस्ताक्षर
मिली जानकारी के अनुसार, कथित तौर पर लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को भेजे गए इस पत्र पर काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदर, शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार मल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायनी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहिर खान, यूसुफ़ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपदा सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मालिया और पार्थ भौमिक के दस्तख़त दिख रहे हैं।
आंकड़ों का गणित क्या कहता है
टीएमसी के अंदरूनी सूत्र दावा करते हैं कि बागी खेमे के पास 19 सांसद नहीं हैं। लेकिन अगर यह गुट बीजेपी में शामिल होने का फ़ैसला करता है, तो बागियों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकेगा, क्योंकि तब वे पार्टी के दो-तिहाई हिस्से के दूसरी पार्टी में विलय की शर्त पूरी कर देंगे। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए गुट में दो-तिहाई सांसदों का होना ज़रूरी है, जो संख्या 18.66 (राउंड-ऑफ करने पर 19) बनती है। वहीं अगर गुट ख़ुद को असली पार्टी होने का दावा करता है — जैसा शिवसेना और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के अलग हुए धड़ों ने सफलतापूर्वक किया था — तो उन्हें विधायी बहुमत के सबूत के साथ चुनाव आयोग का दरवाज़ा खटखटाना होगा।
महुआ मोइत्रा का तीखा हमला
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "गद्दार टीएमसी सांसदों को कानून की जानकारी नहीं है। संविधान के 91वें संशोधन (2003) ने पार्टी में विभाजन या अलग गुट बनाने के प्रावधान को ही ख़त्म कर दिया था। सांसदों की संख्या मायने नहीं रखती, असली राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई हिस्से को दूसरी पार्टी में विलय करना होगा। सभी 19 गद्दारों को इस्तीफा देना होगा और बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना होगा।"
राज्यसभा में संख्या का समीकरण
राज्यसभा में टीएमसी के सदस्यों की संख्या 13 से घटकर 10 रह गई है, क्योंकि सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बारिक — इन तीन सांसदों ने इस्तीफ़ा दे दिया है। विधानसभा में बहुमत वाली बीजेपी उपचुनावों की घोषणा होने पर ये तीनों सीटें जीत लेगी।
टीएमसी में बगावत की शुरुआत क्यों हुई
विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के बाद पार्टी में असंतोष भड़क उठा। कई नेताओं की शिकायत थी कि उनकी राय और सुझावों को अनदेखा किया गया, और इसके लिए कई लोगों ने अभिषेक बनर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया। वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने मीडिया से कहा कि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एवं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी से दो-टूक कहा था कि वे उनके और अभिषेक बनर्जी में से किसी एक को चुन लें। बागी खेमों के समर्थन से लाभ की स्थिति में होने के बावजूद बीजेपी ने फ़िलहाल दूर से ही हालात पर नज़र रखने का रुख़ अपनाया है।
बीजेपी की प्रतिक्रिया
मध्य प्रदेश से निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुने गए राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने मीडिया से कहा कि टीएमसी के भीतर मचा यह घमासान पार्टी नेताओं के "गुनाहों" का नतीजा है। उन्होंने कहा, "...पार्टी के जिन नेताओं ने पश्चिम बंगाल को भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण का अड्डा बना दिया था, उन्हें अब जनता द्वारा सत्ता से बाहर किए जाने के बाद अपने किए की सज़ा भुगतनी पड़ रही है।" बीजेपी के एक अन्य पदाधिकारी ने बताया कि बागी नेता अपनी मर्ज़ी से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं।
भूपेंद्र यादव ने क्या कहा
काकोली दासगुप्ता के नेतृत्व में बागी नेताओं ने इस हफ़्ते दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके आवास पर मुलाक़ात की। यादव राज्य के प्रभारी रह चुके हैं और बंगाल में बीजेपी की पहली जीत के लिए पार्टी की चुनावी रणनीति की देखरेख का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। एक नेता ने कहा, "बीजेपी ने राज्य विधानसभा चुनाव पूरी ईमानदारी से लड़ा और जीता। हम टीएमसी को तोड़ना नहीं चाहते थे, नेता ख़ुद हमारे पास आए। वे एनडीए और राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करना चाहते हैं। अब यह उन्हें तय करना है कि वे एकनाथ शिंदे (शिवसेना) और दिवंगत अजीत पवार (एनसीपी) जैसा रास्ता अपनाना चाहते हैं या फिर आम आदमी पार्टी (के राज्यसभा सदस्यों) की तरह विलय का।"
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