रूस लंबे समय से जिस मुद्दे पर अमेरिका को घेरता आया है, अब उसी विषय पर ट्रंप प्रशासन ने खुद एक बड़ा खुलासा किया है। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर (DNI) तुलसी गैबार्ड के कार्यालय ने दस्तावेज सार्वजनिक कर बताया है कि अमेरिकी सरकार ने दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में 120 से अधिक बायोलैब्स को फंडिंग दी है। इन प्रयोगशालाओं में जैविक रोगाणुओं यानी पैथोजेन्स पर शोध होता रहा है। इनमें यूक्रेन की लैब्स भी शामिल हैं, जिन्हें लेकर रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान बार-बार विवाद खड़ा होता रहा है।
DNI कार्यालय ने 12 जून को जारी अपने बयान में कहा कि इन बायोलैब्स में कुछ ऐसे पैथोजेन्स पर भी काम होता रहा है, जिन्हें खतरनाक माना जाता है। बयान में यह भी कहा गया कि अमेरिकी खुफिया समुदाय पहले ही चेतावनी दे चुका था कि यूक्रेन की एक अमेरिकी फंडिंग वाली लैब में खतरनाक रोगाणु मौजूद हो सकते हैं और वहां रूस के हमले, कब्जे या नुकसान का खतरा बना हुआ था।
अमेरिका बायोलैब्स को फंडिंग क्यों देता है?
यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है, जब तुलसी गबार्ड DNI पद छोड़ने वाली हैं। हालांकि उनके कार्यालय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह सूचना अभी सार्वजनिक क्यों की जा रही है। रिपोर्ट से यह भी साफ नहीं होता कि इसमें कोई बिल्कुल नई या पहले कभी सामने न आई जानकारी शामिल है या नहीं।
दरअसल शीत युद्ध के बाद से अमेरिका 'कोऑपरेटिव थ्रेट रिडक्शन प्रोग्राम' के तहत उन वैज्ञानिक कार्यक्रमों और सुविधाओं को सुरक्षित बनाने में निवेश करता रहा है, जिनका संबंध सोवियत संघ के पुराने जैविक और रासायनिक अनुसंधान ढांचे से था। इनमें यूक्रेन की राजधानी कीव, जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी और पूर्व सोवियत क्षेत्र के अन्य केंद्र शामिल रहे हैं। गबार्ड के अनुसार, ऐसी जानकारियां सार्वजनिक की गई हैं, जिन पर पहले बात करने वाले को विदेशी एजेंट तक करार दे दिया जाता था।
ट्रंप प्रशासन का रुख क्यों सख्त हुआ?
दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने जैविक अनुसंधान और खासकर कोविड-19 की शुरुआत से जुड़े सवालों पर अधिक आक्रामक रवैया अपनाया है। चीन की लैब से कोविड वायरस के लीक होने के आरोप अब भी लगाए जा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी फंडिंग वाली कई प्रयोगशालाओं में 'खतरनाक और बेहद संक्रामक पैथोजेन्स' पर शोध हुआ है और ऐसे काम को कड़ी निगरानी के बिना जारी नहीं रखा जा सकता।
इसी सोच के तहत मई 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके ज़रिए दुनिया भर में अमेरिकी फंडिंग से होने वाली 'गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च' पर रोक लगा दी गई। यह वह शोध है, जिसमें जीवों या रोगाणुओं के जैविक गुणों को बदलकर उनकी क्षमता बढ़ाई जाती है।
रूस लगाता रहा है पुराने आरोप
रूस और पश्चिमी देशों के बीच संबंध बिगड़ने के बाद से मॉस्को लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका विदेशों में ऐसी बायोलैब्स को फंड कर रहा है, जहां संभावित जैविक हथियारों से जुड़ा काम हो सकता है। हालांकि अमेरिका इन आरोपों को लगातार खारिज करता आया है। अमेरिका 1975 के जैविक हथियार प्रतिबंध समझौते का हस्ताक्षरकर्ता भी है। उसका कहना है कि ये लैब्स बीमारी नियंत्रण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए काम करती हैं, न कि जैविक हथियार बनाने के लिए।
यूक्रेन युद्ध में भी उठा था यह मसला
2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर पूर्ण सैन्य हमला शुरू करने के बाद मॉस्को ने बार-बार यूक्रेन में मौजूद अमेरिकी फंडिंग वाली बायोलैब्स का मुद्दा उठाया था। इसके जवाब में 2023 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रूस पर जैविक हथियारों के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप लगाया था। तब मंत्रालय ने कहा था कि रूस यूक्रेन पर अपने हमले से ध्यान भटकाने, कीव के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन घटाने और युद्ध को जायज ठहराने के मकसद से ऐसे दावे कर रहा है।
बायोलैब्स से जुड़ी ज़रूरी बातें
बायोलैब्स का होना अपने आप में कोई हैरानी की बात नहीं है। दुनिया के कई देशों में ऐसी प्रयोगशालाएं मौजूद हैं। इनका इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य, वैक्सीन बनाने और संक्रामक रोगों पर शोध के लिए होता है।
तुलसी गबार्ड के कार्यालय ने फंडिंग और इन लैब्स के अस्तित्व की बात कही है, लेकिन कहीं भी यह दावा नहीं किया गया कि इन प्रयोगशालाओं में जैविक हथियार बनाए गए थे। यह समझना ज़रूरी है कि सामान्य बायोलैब और हथियार बनाने वाली बायोलैब दो अलग-अलग चीजें हैं।
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