भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की एक नई और ऐतिहासिक इबारत लिखी जा रही है, जो आने वाले समय के युद्धों में दुश्मन के हर हवाई हमले को नाकाम करने की ताकत रखती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को हैदराबाद स्थित DRDO की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL) में एडवांस्ड वेपन सिस्टम कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन करते हुए स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) को देश की सुरक्षा संरचना के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर करार दिया।
रक्षा मंत्री ने इस आधुनिक मिसाइल कवच की तुलना द्वापर युग के पौराणिक 'गोवर्धन पर्वत' से की, जिसने कभी ब्रजवासियों की रक्षा की थी। उन्होंने कहा कि ठीक उसी तरह प्रोजेक्ट कुशा भारत के आसमान को दुश्मनों के लिए एक अभेद्य किला बना देगा। उन्होंने यह भी बताया कि साल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस स्वदेशी सिस्टम ने अपनी ताकत साबित करते हुए पूरे क्षेत्र को एक सुरक्षा कवच प्रदान किया था, जिससे यह दुनिया के बेहतरीन एयर डिफेंस सिस्टम्स की कतार में आ खड़ा हुआ है।
प्रोजेक्ट कुशा की 5 खास बातें
- तीन स्तरीय सुरक्षा कवच: इस परियोजना के तहत DRDO तीन अलग-अलग रेंज की इंटरसेप्टर मिसाइलों (M1, M2, M3) को विकसित कर रहा है, जो 150 किलोमीटर से लेकर 400 किलोमीटर तक की दूरी पर ही दुश्मन को मार गिराएंगी।
- मल्टी-थ्रेट काउंटर क्षमता: यह पूरी तरह स्वदेशी लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) सिस्टम है, जो लड़ाकू विमानों (स्टील्थ विमानों समेत), ड्रोन्स, क्रूज मिसाइलों, सटीक-निर्देशित हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों को पलक झपकते ही तबाह कर सकता है।
- मिशन सुदर्शन चक्र का हिस्सा: यह प्रोजेक्ट भारत के व्यापक रक्षा प्लान 'मिशन सुदर्शन चक्र' से जुड़ा है, जिसका मकसद साल 2035 तक देश के ऊपर एक ऐसा मल्टी-लेयर्ड एयर और मिसाइल डिफेंस शील्ड तैयार करना है जिसमें शॉर्ट रेंज (QRSAM) से लेकर लॉन्ग रेंज (Kusha) तक के हथियार शामिल होंगे।
- IACCS के साथ एकीकरण: इस सिस्टम को भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ जोड़ा जाएगा, जिससे सैन्य और नागरिक रडार नेटवर्क के बीच रीयल-टाइम तालमेल बनाकर दुश्मन की टोह लेना बेहद आसान हो जाएगा।
- तैनाती का लक्ष्य: रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने साल 2023 में ही भारतीय वायुसेना के लिए इसकी 5 स्क्वाड्रन की खरीद को मंजूरी (AoN) दे दी थी। उम्मीद है कि साल 2028 से 2030 के बीच इसे पूरी तरह ऑपरेशनल रूप से तैनात कर दिया जाएगा।
प्रोजेक्ट कुशा बनाम रूसी S-400
रूस का S-400 ट्रायम्फ दुनिया का सबसे खतरनाक एयर डिफेंस सिस्टम माना जाता है, जिसे भारत ने भी खरीदा है। लेकिन प्रोजेक्ट कुशा को भारत का अपना देसी S-400 कहा जा रहा है, जो तकनीक और आत्मनिर्भरता के मामले में इसे कड़ी टक्कर देता है।
प्रकार
प्रोजेक्ट कुशा एक स्वदेशी लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) है, जबकि S-400 ट्रायम्फ लॉन्ग से वेरी-लोंग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है।
इंटरसेप्टर वेरिएंट और रेंज
कुशा में 3 वेरिएंट्स (M1, M2, M3 मिसाइलें) हैं, जबकि S-400 में अलग-अलग रेंज की 4 वेरिएंट्स मौजूद हैं। कुशा की अधिकतम मारक क्षमता 350 से 400 किलोमीटर है, वहीं S-400 की लगभग 400 किलोमीटर।
लक्षित खतरे और नेटवर्किंग
कुशा लड़ाकू विमान, स्टील्थ जेट, ड्रोन, क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों को निशाना बना सकता है, जबकि S-400 विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और गाइडेड बैलिस्टिक मिसाइलों को निशाना बनाता है। कुशा को भारतीय वायुसेना के IACCS नेटवर्क के साथ पूरी तरह एकीकृत किया जाएगा, जबकि S-400 रूसी और खरीदार देश के अपने रडार नेटवर्क पर आधारित है।
तैनाती की स्थिति
प्रोजेक्ट कुशा अभी विकास के चरण में है और इसकी तैनाती का लक्ष्य 2028-2030 तक है, जबकि S-400 दुनिया भर में पहले से ही ऑपरेशनल रूप से तैनात है।
रणनीतिक नजरिया
वैश्विक स्तर पर जिस तरह युद्ध के तौर-तरीके बदल रहे हैं, उसमें प्रोजेक्ट कुशा भारत की सैन्य रणनीति के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और आधुनिक सेंसर्स के इस दौर में अब युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आसमान से रिमोट कंट्रोल के जरिए लड़े जा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व के संकट ने यह साफ कर दिया है कि जिस देश का एयर डिफेंस मजबूत नहीं होता, उसे भारी तबाही झेलनी पड़ती है।
भारत अब तक इस स्तर की सुरक्षा के लिए रूस के S-400 सिस्टम पर निर्भर रहा है, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा के आने से विदेशी देशों पर यह निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। ऑपरेशन सिंदूर में इसकी शुरुआती सफलता यह साबित करती है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने विदेशी तकनीक पर निर्भर हुए बिना एक बेहद घातक और सटीक हथियार तैयार कर लिया है। यह न सिर्फ चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर 'टू-फ्रंट वॉर' की स्थिति में भारत को सुरक्षा देगा, बल्कि भविष्य में देश इसे मित्र देशों को निर्यात भी कर सकेगा।
अहम सवाल और जवाब
प्रोजेक्ट कुशा क्या है और इसे कौन विकसित कर रहा है?
प्रोजेक्ट कुशा भारत का एक महत्वाकांक्षी लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (SAM) सिस्टम है। इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित कर रहा है, ताकि भारत को एक अभेद्य हवाई सुरक्षा कवच मिल सके।
राजनाथ सिंह ने इसकी तुलना गोवर्धन पर्वत से क्यों की?
जिस प्रकार द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरे ब्रज क्षेत्र की भारी बारिश और संकट से रक्षा की थी, उसी तरह प्रोजेक्ट कुशा भी दुश्मन की मिसाइलों और हवाई हमलों के खिलाफ पूरे भारत को एक सुरक्षित छत्रछाया (प्रोटेक्टिव अंब्रेला) प्रदान करेगा।
इसकी मिसाइलों की रेंज कितनी होगी?
इस सिस्टम के तहत तीन प्रकार की इंटरसेप्टर मिसाइलें विकसित की जा रही हैं — पहली M1 इंटरसेप्टर (रेंज लगभग 150 किमी), दूसरी M2 इंटरसेप्टर (रेंज लगभग 250 किमी) और तीसरी M3 इंटरसेप्टर (रेंज 350 से 400 किमी)।
यह सिस्टम किस बड़े अभियान में अपनी अहमियत साबित कर चुका है?
यह सिस्टम साल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद तीनों सेनाओं द्वारा संयुक्त रूप से चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी मारक क्षमता और रणनीतिक महत्व को सफलतापूर्वक साबित कर चुका है।
इसे वायुसेना में कब तक तैनात किए जाने की उम्मीद है?
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 2023 में भारतीय वायुसेना के लिए इसकी 5 स्क्वाड्रन की खरीद को मंजूरी दी थी। इस स्वदेशी सिस्टम के साल 2028 से 2030 के आसपास पूरी तरह ऑपरेशनल होने और सेना में तैनात होने की उम्मीद है।
https://hindi.news18.com/news/nation/what-is-project-kusha-air-defence-system-range-speed-cost-who-drdo-planning-to-match-russia-s-400-10565189.html