भारतीय निशानेबाजी जगत के एक मजबूत स्तंभ और अनुभवी कोच जसपाल राणा का अचानक चले जाना खेल की दुनिया के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई मुश्किल है। उनके पार्थिव शरीर को देहरादून लाया गया, जहां अपने गुरु और मार्गदर्शक के अंतिम दर्शन करते ही स्टार निशानेबाज मनु भाकर खुद को संभाल नहीं पाईं और फूट-फूटकर रो पड़ीं।
खेल जगत स्तब्ध
भारतीय शूटिंग के इतिहास में नया अध्याय लिखने वाले दिग्गज कोच और पूर्व ओलंपियन जसपाल राणा का जाना खेल जगत के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है। अपनी सटीक निशानेबाजी के लिए दुनिया भर में पहचाने जाने वाले राणा अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर आते ही पूरे देश और खासतौर पर खेल प्रेमियों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।
देहरादून में उमड़ा शोक
जसपाल राणा का पार्थिव शरीर उनके गृह राज्य उत्तराखंड की राजधानी देहरादून पहुंचा। जैसे ही उनका शव वहां लाया गया, पूरे इलाके में सन्नाटा छा गया। अंतिम दर्शन के लिए उनके आवास पर खेल जगत की हस्तियों, स्थानीय नेताओं और प्रशंसकों का जमावड़ा लग गया। हर आंख नम थी और माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया।
गुरु को देख टूट गईं मनु
इस दुखद घड़ी में राणा की सबसे प्रिय और स्टार शिष्या मनु भाकर पहले से ही देहरादून में मौजूद थीं। अपने गुरु, मार्गदर्शक और पितातुल्य कोच के पार्थिव शरीर को सामने देखकर वे अपने आंसू नहीं रोक सकीं और बिलख पड़ीं। मनु को इस कदर टूटते देख वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें भर आईं।
सिर्फ कोच नहीं, चट्टान की तरह साथ
मनु भाकर और जसपाल राणा का नाता महज एक खिलाड़ी और कोच तक सीमित नहीं था। मनु के करियर के हर उतार-चढ़ाव में राणा एक चट्टान की तरह उनके साथ डटे रहे। जब मनु का फॉर्म गिरा हुआ था या जब वे मानसिक रूप से कमजोर महसूस कर रही थीं, तब राणा ने ही उन्हें संभाला और दोबारा चैंपियन बनाया। मनु के लिए उन्हें खोना एक निजी और कभी न पूरी होने वाली क्षति है।
मनु ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और हाल के वर्षों में जो इतिहास रचा, उसकी पटकथा राणा ने ही लिखी थी। पर्दे के पीछे रहकर मनु की तकनीक निखारना, उनके मनोबल को मजबूत करना और उन्हें दुनिया के सबसे बड़े मंच के लिए तैयार करना उनकी कड़ी मेहनत का ही नतीजा था। आज मनु जो कुछ भी हैं, उसमें उनके कोच का बेहद बड़ा योगदान है।
काशी में होगा अंतिम संस्कार
परिवार के फैसले के अनुसार, महान शूटर और कोच जसपाल राणा का अंतिम संस्कार शनिवार को पवित्र नगरी वाराणसी (काशी) में किया जाएगा। उनके पार्थिव शरीर को देहरादून से वाराणसी ले जाने की तैयारी की जा रही है, जहां गंगा नदी के तट पर वैदिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार संपन्न होगा।
वाराणसी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। राणा का आध्यात्मिक झुकाव और उनके परिवार की इस पवित्र भूमि के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह वजह रही, जिसके चलते अंत्येष्टि के लिए वाराणसी को चुना गया। शनिवार को बाबा विश्वनाथ की नगरी में इस महान खेल नायक को अंतिम विदाई दी जाएगी, जहां खेल जगत के कई दिग्गजों के जुटने की उम्मीद है।
वाराणसी जा सकती हैं मनु
देहरादून में अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के बाद उम्मीद की जा रही है कि मनु भाकर अपने कोच को अंतिम विदाई देने वाराणसी भी पहुंच सकती हैं। मनु इस समय गहरे सदमे में हैं और अपने गुरु के अंतिम सफर में साथ रहकर उन्हें वह सम्मान देना चाहती हैं, जिसकी उनकी यह जोड़ी हमेशा हकदार रही है।
भारतीय शूटिंग के 'द्रोणाचार्य'
जसपाल राणा को भारतीय निशानेबाजी का 'द्रोणाचार्य' कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने सिर्फ मनु भाकर ही नहीं, बल्कि देश के कई युवा निशानेबाजों को तराशकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के काबिल बनाया। उनके जाने से भारतीय शूटिंग के एक सुनहरे दौर का अंत हो गया है, जिसकी कमी आने वाले कई दशकों तक खलती रहेगी।
जसपाल राणा भले ही शारीरिक रूप से इस दुनिया को अलविदा कह गए हों, लेकिन भारतीय खेल इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। उनके तराशे खिलाड़ी जब-जब देश के लिए मेडल जीतेंगे, तब-तब उनकी सीख और तकनीक को याद किया जाएगा। मनु भाकर के आंसुओं ने यह साबित कर दिया कि एक सच्चे गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर होता है।
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