राजनीति में हार और अंदरूनी विरोध कोई असाधारण घटना नहीं हैं, लेकिन किसी दल के लिए असली संकट तब गहराता है जब उसे चुनौती बाहरी प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसके अपने ही लोग देने लगते हैं। जब किसी पार्टी के वरिष्ठ नेता, जनाधार वाले सांसद, फिल्मी हस्तियां और सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले चेहरे एक साथ विरोध में उतर आएं, तो बात केवल सीटों तक सीमित नहीं रहती, सवाल सीधे संगठन के अस्तित्व और भविष्य से जुड़ जाता है।
पश्चिम बंगाल में गहराता सियासी संकट
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो असंतोष शुरू हुआ था, वह अब महज नाराज़गी का मामला नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे पार्टी के लिए अस्तित्व बचाने की लड़ाई का रूप लेता दिख रहा है।
अपनों की बगावत से डगमगाई पकड़
तृणमूल कांग्रेस में बड़े पैमाने पर उभरी बगावत ने ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ को कठघरे में ला खड़ा किया है। पार्टी के दर्जनों विधायक और कई सांसद अलग गुट खड़ा करने की कोशिशों में जुटे बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि सबसे बड़ा खतरा प्रतिद्वंद्वी खेमे से नहीं, बल्कि भीतर से उठ रहा है।
विभाजन को मान्यता मिली तो बदल जाएगी पूरी तस्वीर
राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि अगर यह अंदरूनी विभाजन वैधानिक मान्यता हासिल कर लेता है, तो पार्टी का मौजूदा ढांचा पूरी तरह बदल सकता है। ऐसी स्थिति में तृणमूल कांग्रेस की नेता के सामने आगे का रास्ता बेहद कठिन नजर आ रहा है।
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