खेल जगत के सबसे बड़े आयोजनों में शुमार फीफा वर्ल्ड कप का आगाज 12 जून से हो गया। टूर्नामेंट का पहला ओपनिंग मुकाबला मेक्सिको और साउथ अफ्रीका की टीमों के बीच खेला गया। इस बार फुटबॉल वर्ल्ड कप की मेजबानी अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा मिलकर संयुक्त रूप से कर रहे हैं, जिनमें सबसे ज्यादा मुकाबले अमेरिका में खेले जाएंगे। फुटबॉल प्रेमी इस महाकुंभ का बेसब्री से इंतजार करते हैं और मैचों की टिकट के लिए सबसे अधिक उत्सुकता रहती है। लेकिन इस बार पहले ही दिन हालात कुछ अलग नजर आए, जब साउथ कोरिया और चेक रिपब्लिक के बीच खेले गए मुकाबले के दौरान स्टेडियम की हजारों सीटें खाली रह गईं।
ऊंची टिकट कीमतों ने बदली तस्वीर
फीफा की अधिकांश कमाई हर चार साल में एक बार होने वाले इसी टूर्नामेंट से आती है। साल 1994 से लेकर अब तक वर्ल्ड कप के आयोजन से फीफा को बड़ी कमाई होती रही है और इस बार भी संस्था को मोटी आमदनी की उम्मीद है। इसकी कमाई के प्रमुख स्रोत टिकट बिक्री, हॉस्पिटैलिटी पैकेज, ब्रॉडकास्टिंग राइट्स, स्पॉन्सरशिप और लाइसेंसिंग जैसे माध्यम होते हैं। हालांकि इस बार टिकटों के दामों में भारी बढ़ोतरी देखी गई, जिसका सीधा असर ओपनिंग डे पर पड़ा। कीमतों को लेकर लिया गया फीफा का फैसला पहले ही दिन उल्टा पड़ता दिखाई दिया और ग्वाडलजारा में साउथ कोरिया तथा चेक रिपब्लिक के मुकाबले के दौरान हजारों सीटें खाली नजर आईं। पिछली बार कतर में खेले गए फीफा वर्ल्ड कप की तुलना में इस बार टिकट के दाम पांच गुना तक बढ़ गए हैं।
180000 टिकट रीसेल पोर्टल्स पर ही अटके
इस बार फुटबॉल वर्ल्ड कप के मैचों के लिए फीफा ने टिकट बेचने के वास्ते कीमतों में उतार-चढ़ाव वाला सिस्टम अपनाया है, जिसके तहत किसी समय टिकट के दाम 1100 यूएस डॉलर तक पहुंच गए, यानी मौजूदा भारतीय मुद्रा में यह कीमत 104646 रुपये बैठती है। इतने महंगे दामों के कारण 180000 टिकट रीसेल पोर्टल्स पर ही अटके रह गए। टिकट न बिकने पर आखिरी समय में इनकी कीमतों में कटौती भी की गई, लेकिन इसके बावजूद सीटें खाली रह गईं। इसी वजह से अब अमेरिकी अधिकारियों ने एंटी-ट्रस्ट जांच शुरू कर दी है।
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