PoK में बगावत के बीच मुनीर का अल्टीमेटम: 'शर्तें मानो या धारा 56 लगेगी', भारत के आर्टिकल 370 का बना डाला खौफनाक वर्जन

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में आटा सब्सिडी, बिजली दरों और बुनियादी हक को लेकर भड़के आंदोलन को कुचलने के लिए आसिम मुनीर और शहबाज सरकार ने 'ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी' को शर्तें मानने या अंतरिम संविधान की धारा 56 लागू करने का अल्टीमेटम दिया है, जिसे भारत के आर्टिकल 370 का शैतानी रूप बताया जा रहा है।

पीओके में सुलगते हालात और सेना की नई चाल

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। आटे, बिजली और बुनियादी अधिकारों को लेकर आम जनता का गुस्सा अब खुली बगावत में बदल चुका है। बिजली की दरों और आटा सब्सिडी जैसे बुनियादी मुद्दों पर अपने हक के लिए सड़कों पर उतरे लोगों पर जब पाकिस्तानी सेना ने गोलियां चलाईं, तो दुनिया भर में शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की कड़ी आलोचना हुई। खुली हिंसा के उल्टा पड़ने पर 'फील्ड मार्शल' मुनीर ने अब परदे के पीछे से नई चालें चलनी शुरू कर दी हैं और इसके लिए अंतरिम संविधान की 'धारा 56' को हथियार बना लिया है।

पाकिस्तानी सेना और शहबाज सरकार ने आंदोलन कर रही 'ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) को साफ संदेश दिया है कि या तो वह उनकी शर्तों पर झुक जाए, या फिर अंतरिम संविधान की धारा 56 (Pakistan Article 56) लागू किए जाने के लिए तैयार रहे।

महंगाई और सब्सिडी कटौती के खिलाफ भड़का आंदोलन

महंगाई, आसमान छूती बिजली की कीमतों और आटे पर सब्सिडी खत्म किए जाने के विरोध में महीनों पहले शुरू हुआ JAAC का आंदोलन अब विकराल रूप ले चुका है। गोलियों और हत्याओं से भी जब बात नहीं बनी, तो पाकिस्तान के 'फील्ड मार्शल' ने प्रदर्शनकारियों को आखिरी अल्टीमेटम थमा दिया है — या तो उनकी शर्तों के आगे घुटने टेक दें, या फिर 'आर्टिकल 56' का हंटर झेलने के लिए तैयार रहें। यही वह हथियार है जो पीओके की बची-खुची स्वायत्तता को भी हमेशा के लिए खत्म कर सकता है।

क्या है पाकिस्तान का 'आर्टिकल 56'

जिस इलाके को पाकिस्तान दुनिया के सामने 'आजाद कश्मीर' कहता है, उसके अंतरिम संविधान (AJK Interim Constitution Act, 1974) का आर्टिकल 56 इस्लामाबाद को असीमित और बेहद कठोर अधिकार देता है। इस कानून के तहत पाकिस्तान की संघीय सरकार के पास यह ताकत है कि वह जब चाहे यहां मनमानी कर सके और उसे कानूनी समर्थन भी मिलता रहे।

इस धारा के तहत वहां की जनता द्वारा चुनी गई मुजफ्फराबाद सरकार को एक मिनट में बर्खास्त किया जा सकता है और पूरी विधानसभा को एक झटके में भंग किया जा सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस कार्रवाई के लिए यह देखने की भी जरूरत नहीं कि मुजफ्फराबाद सरकार के पास बहुमत है या नहीं। यह कानून पीओके की पूरी कार्यकारी शक्ति को इस्लामाबाद स्थित 'आजाद कश्मीर काउंसिल' और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के अधीन कर देता है।

भारत के आर्टिकल 370 का शैतानी रूप

जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान की धारा 56 असल में भारत के उसी आर्टिकल 370 का 'शैतानी वर्जन' है, जिसे भारत सरकार ने 2019 में हटा दिया था। भारत ने महाराजा हरि सिंह के साथ विलय समझौते के समय की परिस्थितियों को देखते हुए अनुच्छेद 370 के जरिए कश्मीर को 'विशेष दर्जा' और सुरक्षा की गारंटी दी थी। बाद में जब यह कानून विकास में बाधा बनता दिखा, तो इसे हटा दिया गया।

इसका मकसद साफ था — घाटी से आतंकवाद, अलगाववाद और पथराव को खत्म करना, कश्मीरी जनता को देश के बाकी राज्यों की तरह पूरे अधिकार देना और निवेश व रोजगार के नए रास्ते खोलकर उसे मुख्यधारा से जोड़ना। इसके उलट, पाकिस्तानी सेना भारत में हटाए जा चुके इसी प्रावधान के शैतानी रूप को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। मुनीर धारा 56 का उपयोग किसी विकास के लिए नहीं, बल्कि अपने हक के लिए सड़कों पर उतरी जनता की आवाज को दबाने के लिए करना चाहते हैं। जहां भारत ने 370 हटाकर जनता को अधिकार दिए, वहीं पाकिस्तान धारा 56 लागू कर पीओके की बची-खुची आजादी और लोकतंत्र का भी गला घोंटना चाहता है।

बातचीत की आड़ में तीन प्रस्ताव

पीओके में भड़की बगावत की आग को बुझाने और JAAC के आंदोलनकारियों का हौसला तोड़ने के लिए पाकिस्तान सरकार ने बातचीत के नाम पर बंद कमरों में तीन बड़े प्रस्ताव तैयार किए हैं। इनके पीछे की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि इनमें बातचीत का दिखावा भी है और बर्बादी की धमकी भी।

  • प्रस्ताव 1: पाकिस्तान की सभी राजनीतिक पार्टियों का एक हाई-पावर डेलीगेशन मुजफ्फराबाद भेजा जाएगा। यह डेलीगेशन वहां के स्थानीय नेताओं और JAAC के उन सदस्यों से बातचीत का नाटक करेगा जिन्हें सरकार ने 'प्रतिबंधित' या बैन नहीं किया है, ताकि आंदोलन में फूट डाली जा सके।
  • प्रस्ताव 2: आगामी 27 जुलाई को होने वाले आम चुनावों को तय समय पर ही होने दिया जाए। इसके बाद नई विधानसभा के जरिए विवादित '12 शरणार्थी सीटों' को घटाकर आधा यानी 06 कर दिया जाए। ये सीटें 1947 के शरणार्थियों के नाम पर पंजाब, सिंध आदि मुख्य प्रांतों में रहने वाले लोगों के लिए रिजर्व हैं। इस्लामाबाद इन सीटों का इस्तेमाल हमेशा से अपनी पसंदीदा कठपुतली सरकार बनाने के लिए करता रहा है और स्थानीय कश्मीरी लोग इन्हें पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहे हैं।
  • प्रस्ताव 3: यदि JAAC या वहां का कोई भी राजनीतिक दल इन शर्तों को मानने से इनकार करता है, तो बिना देर किए तुरंत आर्टिकल 56 थोप दिया जाएगा। इसके बाद मुजफ्फराबाद की सत्ता की चाबी सीधे इस्लामाबाद के हाथों में चली जाएगी और वहां फौजी राज कायम हो जाएगा।

पीओके पर पाकिस्तान का पाखंड उजागर

इस पूरे विवाद ने पाकिस्तान के उस झूठ को भी बेनकाब कर दिया है, जिसे वह वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पेश करता आया है। सच यह है कि पाकिस्तान का खुद का 1973 का संविधान भी पीओके को अपने देश का औपचारिक हिस्सा या पांचवां प्रांत नहीं मानता। उसके संविधान के आर्टिकल 1 का क्लॉज (2)(d) इसे 'अन्य माध्यमों से शामिल होने वाला क्षेत्र' बताता है, जबकि आर्टिकल 257 कहता है कि जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान के साथ जुड़ने का फैसला करेंगे, तब दोनों के संबंध तय होंगे।

हालांकि इस कागजी आजादी के पीछे की हकीकत कुछ और ही है। जमीनी सच्चाई यह है कि पीओके पर पूरी तरह पाकिस्तानी सेना का नियंत्रण है।

  • रक्षा और सुरक्षा: यहां पूरी तरह पाकिस्तानी सेना का नियंत्रण है।
  • विदेश मामले: पीओके का दुनिया में कोई 'आजाद अस्तित्व' नहीं है।
  • विदेशी व्यापार: व्यापार से जुड़े सारे फैसले इस्लामाबाद लेता है।
  • करेंसी: यहां पाकिस्तानी रुपया ही चलता है।
  • यूएन के फैसले: संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करने पर भी पाकिस्तान का ही एकाधिकार है।

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