लाक्षागृह से बचकर पांडव पहुंचे थे उत्तराखंड की इस नगरी में, आज है शानदार पर्यटन स्थल

महाभारत काल में चकराता को 'चक्रनगरी' या 'एकचक्र' कहा जाता था, जहां लाक्षागृह की साजिश से बचकर पांडवों ने अज्ञातवास का करीब एक महीना बिताया था। आज यह स्थान एक खूबसूरत और शांत हिल स्टेशन के रूप में पहचाना जाता है।

उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसे देहरादून की पहचान सिर्फ उसकी प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की धरती पौराणिक गाथाओं की साक्षी भी रही है। देहरादून से करीब 90 किलोमीटर दूर बसा चकराता आज एक बेहद सुंदर और शांत हिल स्टेशन है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत काल में इसी जगह को 'चक्रनगरी' के नाम से जाना जाता था। यह वही स्थान है, जहां लाक्षागृह की साजिश से बचकर निकलने के बाद पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान करीब एक महीने का समय गुजारा था।

उत्तराखंड का छिपा हुआ रत्न

देहरादून के स्थानीय निवासी और साहित्यकार मनोज इष्टवाल बताते हैं कि उत्तराखंड की शांत वादियों में बसा चकराता एक ऐसा हिल स्टेशन है, जो भीड़भाड़ से दूर प्रकृति की गोद में सुकून का एहसास कराता है। देहरादून से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह स्थान समुद्र तल से करीब 7 हजार फीट की ऊंचाई पर है।

उन्होंने बताया कि ऊंचे-ऊंचे देवदार और बांज के जंगलों से घिरा चकराता प्रकृति प्रेमियों, शांति की तलाश में निकले लोगों और ट्रेकर्स के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहां की ठंडी हवाएं और हर ओर फैली हरियाली पहली ही नजर में किसी का भी मन मोह लेती हैं। इष्टवाल के मुताबिक, चकराता का इतिहास जितना दिलकश है, पौराणिक गाथाओं से उसका रिश्ता भी उतना ही गहरा है।

'एकचक्र' के रूप में भी पहचान

इष्टवाल के अनुसार, महाभारत काल में इस इलाके को 'चक्रनगरी' या 'एकचक्र' के नाम से जाना जाता था। पौराणिक मान्यताओं की मानें तो जब पांडव दुर्योधन की लाक्षागृह वाली साजिश से बचकर निकले थे, तब उन्होंने अपने अज्ञातवास का करीब एक महीने का समय इसी चक्रनगरी में बिताया था।

इस नगरी की खास भौगोलिक बनावट और चारों ओर पहाड़ों से घिरे होने के कारण इसे एक सुरक्षित दायरे या 'एकचक्र' के रूप में देखा जाता था, और इसी वजह से इसका यह नाम पड़ा।

बकासुर वध की ऐतिहासिक गाथा

मनोज इष्टवाल ने बताया कि इस ऐतिहासिक नगरी के पास एक प्राचीन गुफा मौजूद थी, जिसमें बकासुर नाम का एक बेहद क्रूर और शक्तिशाली राक्षस रहता था। उसने नगरवासियों को डरा-धमकाकर यह नियम थोप रखा था कि लोग हर दिन उसके लिए भारी मात्रा में भोजन और एक इंसान को बलि के रूप में भेजेंगे।

जब पांडव अपनी माता कुंती के साथ भेष बदलकर यहां एक ब्राह्मण के घर में रह रहे थे, तब भीम ने उस परिवार की रक्षा का संकल्प लिया। भीम स्वयं बकासुर का भोजन लेकर पहुंचे और एक भीषण युद्ध के बाद उस राक्षस का वध कर दिया। इस तरह उन्होंने चक्रनगरी के लोगों को हमेशा के लिए राक्षस के आतंक से मुक्ति दिला दी।

ब्रिटिश काल की छावनी और आधुनिक चकराता

इष्टवाल बताते हैं कि पौराणिक इतिहास के साथ-साथ चकराता का एक आधुनिक और ऐतिहासिक पक्ष भी है। साल 1866 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने इस जगह की रणनीतिक स्थिति और सुहावने मौसम को देखते हुए इसे एक ब्रिटिश सैन्य छावनी के रूप में विकसित किया था।

आज भी चकराता का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना के नियंत्रण में है, खासतौर पर यहां प्रतिष्ठित 'एलीट फ्रंटियर फोर्स' का बेस मौजूद है। सैन्य क्षेत्र होने की वजह से यहां अन्य हिल स्टेशनों की तुलना में बेतहाशा व्यावसायिक निर्माण नहीं हो पाया है, जिसके चलते इसकी प्राकृतिक शुद्धता और शांति आज भी बरकरार है।

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