45 डिग्री की भीषण तपिश में भी हरी-भरी रहती है यह घास, जालौर के किसानों-पशुपालकों का बनी सहारा

जालौर के हरमू गांव में मिलने वाली धामण घास 45 डिग्री से अधिक तापमान में भी नहीं सूखती और गर्मियों में हरे चारे की कमी के बीच पशुपालकों व किसानों के लिए जीवनरेखा साबित हो रही है।

राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में जून की चिलचिलाती धूप और 45 डिग्री से ज्यादा तापमान जीवन को बेहद मुश्किल बना देता है। ऐसे कठिन मौसम में भी एक खास घास अपनी हरियाली बरकरार रखती है। यह है धामण घास, जिसे मरुस्थल की जीवनरेखा और हरियाली की मिसाल कहा जाता है।

धामण घास की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह पूरे साल नहीं सूखती और प्रचंड गर्मी में भी हरी बनी रहती है। जून की लू और तपते मौसम में जब चारों ओर सूखा दिखाई देता है, तब भी यह घास धरती को हरा-भरा बनाए रखती है। बारिश के मौसम में यह तेजी से बढ़कर लंबी हो जाती है। इसकी मजबूत जड़ें मिट्टी को कसकर पकड़े रखती हैं, जिससे भूमि का कटाव रुकता है और मरुस्थलीकरण की समस्या को थामने में मदद मिलती है।

हरमू गांव में सालभर हरी रहती है घास

जालौर जिले में धामण घास का खास महत्व देखने को मिलता है। खासतौर पर हरमू गांव में किसान मुरारदान बारहठ के खेतों में यह घास प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। यहां यह पूरे साल हरी रहती है और भीषण गर्मी में भी नहीं सूखती। स्थानीय किसान इसे अपने पशुओं के लिए एक अहम सहारा मानते हैं, क्योंकि गर्मियों में जब हरे चारे की किल्लत हो जाती है, तब यह घास लगातार उपलब्ध रहती है। यही वजह है कि हरमू गांव में पशुपालन और खेती, दोनों के लिए यह घास बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

खेती और पशुपालन में बड़ा योगदान

खेती और पशुपालन के क्षेत्र में धामण घास का अहम योगदान है। इसे जैविक खेती में हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और फसल उत्पादन बेहतर होता है। वहीं पशुपालन के लिहाज से यह एक पौष्टिक चारे का काम करती है। इसके सेवन से पशुओं की सेहत अच्छी रहती है और दूध उत्पादन में भी सुधार देखा गया है। गर्मी के मौसम में जब हरे चारे की भारी कमी हो जाती है, तब यह घास किसानों और पशुपालकों के लिए मजबूत सहारा बनकर सामने आती है।

किसानों के लिए उम्मीद की घास

स्थानीय किसान मुरारदान बारहठ बताते हैं कि यह घास उनके क्षेत्र के पशुपालकों के लिए बहुत फायदेमंद है। उनके मुताबिक, धामण घास भीषण गर्मी में भी हरी रहती है और पशुओं को पर्याप्त पोषण देती है। इससे न सिर्फ चारे की समस्या कम होती है, बल्कि दूध उत्पादन पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।

धामण घास महज एक साधारण घास नहीं, बल्कि मरुस्थलीय जीवन की एक अहम कड़ी है। यह पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की रक्षा, जैविक खेती और पशुपालन—इन चारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हरमू गांव जैसे इलाकों में यह घास किसानों के लिए उम्मीद और सहारा बनकर उभरी है।

https://hindi.news18.com/news/rajasthan/jalore-dhaman-grass-becomes-lifeline-of-desert-support-for-farmers-of-jalore-local18-ws-l-10564211.html