मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव से जुड़े चर्चित नामांकन विवाद में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को यह राजनीतिक और कानूनी टकराव एक अहम मोड़ पर पहुंच गया, जब अदालत ने उनकी ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में उसके अधिकार क्षेत्र की सीमाएं हैं और चुनावी प्रक्रिया में सीधे दखल देने का कोई आधार नहीं बनता।
इस फैसले के साथ ही राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की सबसे बड़ी कानूनी उम्मीद समाप्त होती दिखी। यह विवाद केवल एक उम्मीदवार के नामांकन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुनवाई के दौरान चुनावी प्रक्रिया, नामांकन निरस्तीकरण, न्यायिक हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर व्यापक बहस हुई। कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कई कानूनी तर्क रखे, लेकिन अदालत ने पूर्व न्यायिक परंपराओं और संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए याचिका स्वीकार नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट और अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट की हस्तक्षेप संबंधी सीमाएं तय हैं। अदालत ने संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाने और परिणाम घोषित हो जाने के बाद न्यायिक दखल का दायरा बेहद सीमित रह जाता है।
कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि क्या कोई ऐसी न्यायिक मिसाल मौजूद है, जिसमें नामांकन निरस्त होने के बाद अदालत ने रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय को पलटते हुए किसी उम्मीदवार का नामांकन बहाल किया हो।
कांग्रेस की दलील
कांग्रेस की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि संबंधित मामला केवल एक निजी शिकायत से जुड़ा है और अब तक अदालत ने उसमें विधिवत संज्ञान नहीं लिया था। उन्होंने कहा कि केवल नोटिस या समन जारी होना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
सिंघवी ने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में हर उम्मीदवार को समान अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि किसी प्रत्याशी को पर्याप्त कानूनी आधार के बिना चुनावी मैदान से बाहर कर दिया जाए, तो इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
मीनाक्षी नटराजन की पहली प्रतिक्रिया
फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार मानने से इनकार किया। उनके अनुसार यह लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा है।
हमारी तरफ से कोई गलती नहीं थी। यह केवल एक उम्मीदवार का मामला नहीं है, बल्कि देश और लोकतंत्र के लिए झटका है। हम जनता की अदालत में जाएंगे।
उन्होंने कहा कि आगे की रणनीति पार्टी नेतृत्व से चर्चा के बाद तय की जाएगी।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद
मीनाक्षी नटराजन ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। जांच के दौरान उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज की गई, जिसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने नामांकन निरस्त कर दिया। कांग्रेस ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए पहले राजनीतिक स्तर पर विरोध दर्ज कराया और बाद में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। पार्टी का आरोप था कि नामांकन खारिज करने की प्रक्रिया में गंभीर कानूनी त्रुटियां हुई हैं।
भाजपा के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित
नामांकन निरस्त होने के बाद चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए और भाजपा के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो गए। इसी घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग और तेज कर दी थी।
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