बालाघाट का यह चावल जिसके दीवाने रहे दो-दो प्रधानमंत्री, जीआई टैग मिलते ही विदेशों में बढ़ी मांग, जानें इसकी खूबियां

बालाघाट के वारासिवनी में उगने वाला चिन्नौर चावल अपने मीठे स्वाद और मुलायम बनावट के लिए मशहूर है। साल 2022 में इसे जीआई टैग मिला और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी पहचान बन रही है।

मध्य प्रदेश के बालाघाट को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। यहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है और कई पारंपरिक किस्में उगाई जाती हैं, जिनकी मांग सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी रहती है। इन्हीं में से एक है चिन्नौर चावल, जो देखने में बेहद साधारण लगता है लेकिन स्वाद में लाजवाब है। यह किस्म बालाघाट की ही उपज है और इसका उत्पादन वारासिवनी इलाके में होता है। एक दौर में यह चावल देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों की पसंद भी बन चुका था।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमका चिन्नौर

इंदौर में आयोजित ब्रिक्स कृषि सम्मेलन के ग्रामीण हाट बाजार में विशेष कृषि उत्पादों के बीच बालाघाट के चिन्नौर चावल को भी प्रदर्शित किया गया। यहां कई देशों के प्रतिनिधिमंडल ने इस चावल की जमकर सराहना की। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे अलग पहचान मिलने की संभावना बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इससे किसानों के एफपीओ भी बन सकते हैं, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका निर्यात पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगा।

2019 में किया था जीआई टैग का दावा

चिन्नौर चावल की उपज वारासिवनी के कायदी इलाके में होती है और ऐसा माना जाता है कि यहां की जलवायु इस चावल के लिए सबसे उपयुक्त है। इसी आधार पर साल 2019 में बालाघाट के कृषि विभाग ने हैदराबाद स्थित चावल निदेशालय में जीआई टैग का दावा पेश किया था। आखिरकार साल 2022 में चिन्नौर के लिए बालाघाट को जीआई टैग हासिल हुआ।

क्या है चिन्नौर की खासियत

चिन्नौर चिकना और नोकदार चावल है। इसका स्वाद मीठा होता है और खाने में यह मुलायम लगता है। पकने में इसे बहुत कम समय लगता है, इसीलिए खीर के लिए इसे बेहतर माना जाता है। ठंडा होने के बाद भी यह चावल नर्म बना रहता है।

असली चिन्नौर की पहचान करनी हो तो उसके पांच से छह दाने अच्छी तरह चबाकर खाने पर उसका स्वाद लंबे समय तक मुंह में बना रहता है। इस चावल में राइस ब्रान की मात्रा 17-18 प्रतिशत होती है, जबकि चिन्नौर धान की बात करें तो इसमें यह मात्रा 20-21 प्रतिशत होती है।

दो प्रधानमंत्रियों से जुड़ा है दिलचस्प किस्सा

वारासिवनी के रहने वाले अनिल पिपरवार बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब बालाघाट के कायदी से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए चिन्नौर चावल भेजा जाता था। इसके बाद जब भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बालाघाट के मलाजखंड आई थीं, तब उन्हें भी चिन्नौर चावल भेंट किया गया था। बाद में भी कई बार बालाघाट से दिल्ली उनके लिए यह चावल भेजा गया।

अब भी नाराज हैं चिन्नौर उत्पादक किसान

अनिल पिपलेवार का कहना है कि भले ही बालाघाट के चिन्नौर चावल को जीआई टैग मिल चुका है, लेकिन उसे उस स्तर की वैश्विक पहचान नहीं मिल पाई है। साथ ही किसानों को भी उतना लाभ नहीं मिल पा रहा है, जितना मिलना चाहिए। उनका मानना है कि सरकार को इस चावल को और बेहतर ढंग से प्रचारित करना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि इसकी मार्केटिंग पर ध्यान दिया जाए, ताकि अधिक से अधिक किसान इसकी खेती कर सकें।

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