धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धरती पर दो ऐसे पावन कुंड मौजूद हैं, जिनका निर्माण भगवान शिव के आंसुओं से होना बताया जाता है। कहा जाता है कि इन कुंडों में स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पाप धुल जाते हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक इनमें से पहला कुंड राजस्थान के पुष्कर में है, जिसे आज पवित्र पुष्कर झील के रूप में पहचाना जाता है। माना जाता है कि यहां स्नान करने से न केवल पापों से मुक्ति मिलती है, बल्कि मन को शांति भी प्राप्त होती है। वहीं दूसरा कुंड पड़ोसी देश पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, जिसे 'कटास राज कुंड' के नाम से जाना जाता है।
पाकिस्तान में मौजूद है शिव के आंसू से बना पावन कुंड
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चकवाल जिले में स्थित कटासराज मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है। यूं तो साल भर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है, मगर महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां सबसे अधिक भक्तों की भीड़ जुटती है। धार्मिक धारणा है कि इस मंदिर परिसर में बने कुंड का जल कभी सूखता नहीं, और यह देखकर हर कोई अचंभित रह जाता है। इतना ही नहीं, इस पवित्र कुंड के पानी को औषधीय गुणों से युक्त भी माना जाता है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस कुंड में स्नान करने से शारीरिक कष्टों से छुटकारा मिलता है। एक मान्यता यह भी है कि वनवास के समय पांडवों ने अपने जीवन के कुछ वर्ष यहीं व्यतीत किए थे। इसके अतिरिक्त यह स्थान वही बताया जाता है, जहां यक्ष ने पांडवों की परीक्षा ली थी और इसमें युधिष्ठिर ने सफल होकर अपने भाइयों को पुनर्जीवन दिलाया था।
इन पवित्र कुंडों से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब राजा दक्ष ने अपने यहां यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने माता सती और भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। इसके बावजूद माता सती वहां जाने के लिए हठ करने लगीं। महादेव के समझाने पर भी जब वे नहीं मानीं, तो भगवान ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। शिव यह जानते थे कि वहां जो कुछ होने वाला है, उसे देवी सती सहन नहीं कर सकेंगी। जैसे ही सती यज्ञ में सम्मिलित होने पहुंचीं, उनके पिता ने उनके पति यानी भगवान शिव का जमकर अपमान किया। पिता द्वारा किया गया यह अपमान माता सहन न कर सकीं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। जब इसका पता भगवान शिव को चला तो वे गहरे शोक में डूब गए और उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसी क्षण भगवान के आंसुओं की दो बूंदें धरती के दो स्थानों पर जा गिरीं, जहां इन पवित्र कुंडों का निर्माण हुआ।
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