मानसून 2026 पर मंडराया 2015 जैसा सूखा! IMD के नए अलर्ट ने बढ़ाई किसानों की चिंता, कहां होगी सबसे कम बारिश?

मौसम विभाग ने 2026 के मानसून का अनुमान घटाकर एलपीए का 90 प्रतिशत कर दिया है, जिससे यह 2015 के बाद का सबसे सूखा साल बन सकता है। अल नीनो के कारण मानसून ब्रेक लंबा होने की आशंका है, जिसका सबसे ज्यादा असर छोटे किसानों और ग्रामीण इकॉनमी पर पड़ सकता है।

मानसून 2026 को लेकर मौसम विभाग (IMD) के ताजा अपडेट ने किसानों और अर्थव्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। विभाग ने पिछले हफ्ते 2026 के मानसून पूर्वानुमान को घटाकर लॉन्ग पीरियड एवरेज (एलपीए) का 90 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले अप्रैल में यही अनुमान 92 प्रतिशत आंका गया था। अगर यह आकलन सच साबित हुआ तो 2026 का मानसून 2015 के बाद सबसे सूखा माना जाएगा।

एलपीए का तात्पर्य देश भर में मानसून के दौरान होने वाली 87 सेंटीमीटर बारिश से है। यह रिपोर्ट निश्चित रूप से चिंता बढ़ाने वाली है। हालांकि विभाग के इस अनुमान में 5 प्रतिशत की गलती की गुंजाइश भी मौजूद है। आगे हम समझेंगे कि यह मानसून 2015 से किस तरह मिलता-जुलता है और अल नीनो का असर किसानों पर किस रूप में पड़ सकता है।

2026 की तुलना आखिर 2015 से क्यों हो रही है?

आईएमडी के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2015 में मानसून बेहद कमजोर रहा था। उस वर्ष जून से सितंबर तक के चार महीनों में कुल बारिश एलपीए की केवल 86 प्रतिशत रही थी। इस तरह 2014 और 2015 लगातार दो ऐसे साल बन गए, जब कम बारिश दर्ज की गई।

मौसम विभाग के 115 साल के रिकॉर्ड में ऐसा सिर्फ चौथी बार हुआ था। इससे पहले 1904 और 1905 में यह स्थिति बनी थी। फिर 1965 और 1966 में सूखे जैसे हालात उभरे। इसके बाद 1986 और 1987 में भी लगातार दो साल कम बारिश हुई। अब 2026 को लेकर भी वैसा ही डर सता रहा है और आईएमडी का नया अनुमान इसी ओर इशारा करता है।

2015 में बारिश की चाल कैसी रही?

साल 2015 में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत काफी अच्छी रही थी। जून में सामान्य से 16 प्रतिशत अधिक बारिश हुई, लेकिन इसके बाद अचानक रफ्तार धीमी पड़ गई। जुलाई 2015 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 16 प्रतिशत नीचे चला गया।

अगस्त में स्थिति और बिगड़ी और बारिश 22 प्रतिशत तक कम रही। सितंबर आते-आते यह कमी 24 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसके बावजूद जून की अच्छी बारिश की वजह से शुरुआती दो महीनों में कुल कमी मात्र 4 प्रतिशत ही रही।

2014 और 2015 का डेटा आज क्यों मायने रखता है?

अगर 2014 की बात करें तो उस साल हालात और भी कठिन नजर आते हैं। 2014 भी कमजोर मानसून वाला वर्ष माना जाता है। उस सीजन के पहले दो महीनों के बाद मानसून की कमी लगभग 22 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

दूसरी ओर 2015 में कुल कमी के बावजूद कुछ अवधि ऐसी रही जब बारिश लगभग सामान्य थी। विभाग का डेटा दिखाता है कि जुलाई 2015 में पूरे देश में बारिश 16 प्रतिशत कम रहने के बावजूद मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा बारिश दर्ज हुई।

इसी प्रकार अगस्त 2015 में कुल बारिश औसत से करीब 22 प्रतिशत कम रही, फिर भी पूर्वी प्रायद्वीपीय इलाके में कुछ जगह ठीक-ठाक बारिश हुई। यह बारिश मुख्य रूप से तमिलनाडु और पुराने आंध्र प्रदेश तक सीमित रही। सितंबर 2015 में पूरे देश में बहुत कम बारिश हुई और जिन इलाकों में जून में अच्छी बारिश हुई थी, वहां भी बाद में भारी कमी देखी गई। हालांकि इसी दौरान ओडिशा और उसके आसपास के क्षेत्रों में मानसून सक्रिय बना रहा।

क्या बारिश का बंटवारा कुल मात्रा से ज्यादा अहम है?

सिर्फ कितनी बारिश हुई, यह जानना पर्याप्त नहीं है। असल सवाल यह है कि बारिश कहां और कब हुई। 2026 के मानसून की असली कहानी भी इसी पर टिकी रहेगी। भले ही कुल बारिश कम रहे, लेकिन कुछ इलाकों में अच्छी बारिश हो सकती है। मौसम विशेषज्ञ इन्हीं इलाकों और समय पर बारीकी से निगरानी रखते हैं।

2015 में उत्तर-पश्चिम भारत में एलपीए की 83 प्रतिशत बारिश हुई थी। मध्य भारत में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत और दक्षिणी प्रायद्वीप में 85 प्रतिशत रहा। इसके उलट पूर्वोत्तर भारत में 92 प्रतिशत बारिश दर्ज की गई।

देश में मौसम के 36 उपमंडल हैं। इनमें से 18 उपमंडलों में सामान्य बारिश हुई थी, जो देश के 55 प्रतिशत हिस्से को कवर करते हैं। वहीं 17 उपमंडलों में कम बारिश रही, जो देश का 39 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। इसके अलावा पश्चिमी राजस्थान के एक उपमंडल में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई, जो देश का 6 प्रतिशत हिस्सा है।

अल नीनो में मानसून ब्रेक सबसे बड़ा खतरा क्यों?

मौसम अधिकारी बताते हैं कि अल नीनो वाले साल में सिर्फ बारिश की मात्रा ही कम नहीं होती, बल्कि मानसून का ब्रेक भी सामान्य से कहीं अधिक लंबा खिंच जाता है। मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज के पूर्व सचिव और मानसून विशेषज्ञ माधवन राजीवन के अनुसार सामान्य मानसून वाले साल में आमतौर पर 7-8 दिनों का ब्रेक होता है।

राजीवन का कहना है कि अल नीनो वाले साल में ये ब्रेक अक्सर लंबे हो जाते हैं। यह ब्रेक 15-20 दिनों तक खिंच सकता है और किसी खास इलाके में 25 दिनों तक भी पहुंच सकता है।

उनके मुताबिक आईएमडी लगभग 60 प्रतिशत कम बारिश की आशंका जता रहा है। इसका अर्थ है कि इस साल मानसून के खराब रहने की संभावना काफी अधिक है। फिलहाल यह तय नहीं है कि बारिश का बंटवारा कैसा रहेगा और यह कितनी समान रूप से फैलेगी।

किस इलाके के किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान?

आमतौर पर अल नीनो वाले साल में मध्य भारत में हालात मुश्किल रहते हैं। प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्सों और दक्षिणी प्रायद्वीप में भी मानसून का मौसम काफी कठिन साबित होता है। राजीवन के अनुसार पूर्वोत्तर में अच्छी बारिश होगी, जहां कहीं-कहीं बाढ़ की भी आशंका जताई जा सकती है।

इस साल अल नीनो के चलते मानसून ब्रेक के और लंबा होने की संभावना है। 2026 के मानसून में मुश्किल मौसम के संकेत स्पष्ट दिख रहे हैं, लेकिन 2015 का अनुभव बताता है कि इसका असर पूरे भारत में एक जैसा नहीं होगा। कुछ इलाकों में अच्छी बारिश होगी तो कहीं हालात बेहद खराब रहेंगे।

अब पूरा फोकस उन खास इलाकों पर होना चाहिए जहां बारिश कम रहेगी। खासकर उन छोटे किसानों पर ध्यान देना जरूरी है जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। ये किसान अपनी छोटी जमीन पर केवल एक या दो फसलें ही उगा पाते हैं और इनके लिए बारिश की कमी जीवन-मरण का सवाल बन जाती है।

क्या कमजोर मानसून ग्रामीण इकॉनमी पर भारी पड़ेगा?

मानसून का सीधा असर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। राजीवन इसे बेहद सरल शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि आमतौर पर हम पूरे भारत में चावल के उत्पादन जैसे आंकड़ों पर बात करते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर शायद उत्पादन ज्यादा न गिरे, लेकिन स्थानीय स्तर पर छोटे किसानों के लिए हालात बहुत खराब हो सकते हैं।

कुल मिलाकर देश की जीडीपी पर शायद कोई बहुत बड़ा नकारात्मक असर न दिखे, लेकिन अल नीनो वाले साल में स्थानीय असर बहुत बड़ा हो सकता है। इसलिए इस जमीनी असर को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। बड़े और एग्रीगेट आंकड़ों में ये छोटे, मगर अहम स्थानीय प्रभाव अक्सर छिप जाते हैं।

यही स्थानीय असर तय करेंगे कि वित्तीय वर्ष 2027 के बाकी हिस्से में ग्रामीण भारत की हालत कैसी रहेगी। छोटे किसानों की मुश्किलें ही असली ग्रामीण संकट की तस्वीर पेश करेंगी। ऐसे में सरकार को समय रहते इन किसानों के लिए बेहतर नीति तैयार करनी होगी।

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