उत्तराखंड के पहाड़ी और सीढ़ीदार खेतों में भरपूर फसल लेने तथा जमीन की ताकत बनाए रखने के मामले में पशुओं का गोबर किसी वरदान से कम नहीं है। रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाकर यह देसी विकल्प न सिर्फ खर्च कम करता है, बल्कि लंबे समय तक खेत की सेहत भी संवारता है।
ढलानदार खेतों की सबसे बड़ी चुनौती
स्थानीय किसान किशन मलड़ा के अनुसार, पहाड़ों के ढलान वाले खेतों में मानसून के दौरान उपजाऊ मिट्टी का बह जाना एक बड़ी समस्या है। बारिश के पानी के साथ खेत की ऊपरी उर्वर परत बहकर निकल जाती है, जिससे पैदावार पर सीधा असर पड़ता है। इस नुकसान से खेत को बचाने में गोबर की खाद बेहद कारगर मानी जाती है।
मिट्टी की सेहत के लिए कुदरती ताकत
यह प्राकृतिक खाद केवल मिट्टी का कटाव ही नहीं रोकती, बल्कि जमीन में केंचुओं और जरूरी सूक्ष्मजीवों की संख्या भी बढ़ाती है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि मिट्टी की नमी सोखने की क्षमता दोगुनी हो जाती है, जिससे फसल को लगातार पोषण और पानी मिलता रहता है।
ताजे की जगह सड़ी हुई खाद क्यों बेहतर
खेत में ताजा गोबर डालने के बजाय अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का इस्तेमाल करना वैज्ञानिक रूप से अधिक लाभकारी होता है। सड़ी खाद पौधों को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराती है और मिट्टी की संरचना को भी मजबूत बनाती है।
कम लागत में बंपर मुनाफे का नुस्खा
जीवामृत जैसे देसी तरीकों को अपनाकर किसान बहुत कम खर्च में अपनी फसल से बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। महंगी रासायनिक खादों के बिना भी यह तरीका खेत को सालों तक उपजाऊ बनाए रखता है, जिससे पहाड़ी किसानों के लिए खेती फायदे का सौदा बन जाती है।
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