आम तौर पर लोग 60 से 65 की उम्र में आराम और रिटायरमेंट की योजना बनाने लगते हैं, लेकिन पटना के 65 वर्षीय उज्जवल कुमार की कहानी इससे एकदम अलग है। कोरोना महामारी के दौरान उनका सालों पुराना कारोबार पूरी तरह बैठ गया और जीवन भर की जमा-पूंजी भी खत्म हो गई। हालत यहां तक पहुंच गई कि रोज़मर्रा का खर्च जुटाना भी कठिन हो गया। ऐसे मुश्किल समय में एक विचार ने न सिर्फ उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी, बल्कि कमाई का नया रास्ता भी खोल दिया।
कार बनी स्नैक्स कार्ट
इसी दौर में उनकी पत्नी ने एक अनोखा सुझाव दिया। दोनों ने अपनी ड्रीम कार को ही स्नैक्स कार्ट में तब्दील कर दिया और हेल्दी स्नैक्स बेचने का काम शुरू कर दिया। आज इसी विचार की बदौलत न केवल उनका घर-परिवार चल रहा है, बल्कि बेटी की पढ़ाई का खर्च भी निकल रहा है। उज्जवल बताते हैं कि कभी यह कार घूमने-फिरने और अपने शौक पूरे करने के लिए खरीदी गई थी, पर आज वही कार पूरे परिवार की रोज़ी-रोटी का मुख्य जरिया बन चुकी है।
पत्नी की सोच से शुरू हुआ सफर
उज्जवल कुमार के मुताबिक हेल्दी फूड का आइडिया उनकी पत्नी के दिमाग से आया। वे कहते हैं, 'जब भी हम दोनों बाहर खाने जाते थे, तब स्वादिष्ट चीजें तो खूब मिलती थीं, लेकिन सेहतमंद विकल्प बहुत कम नजर आते थे। तभी हमने सोचा कि लोगों को ऐसा खाना दिया जाए जो स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी अच्छा हो।'
इसी सोच के साथ उन्होंने काम की नींव रखी। यहां परोसे जाने वाले सभी व्यंजन घर पर ही बनाए जाते हैं। पति-पत्नी मिलकर सुबह से ही खाना तैयार करने में जुट जाते हैं और फिर उसे अलग-अलग कंटेनरों में भरकर ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि हर डिश में तेल और मसाले का इस्तेमाल बेहद कम हो। पाव भाजी से लेकर सांभर और पोहा तक को सेहतमंद ढंग से बनाया जाता है। यहां सॉस की जगह धनिया, पुदीना और करी पत्ते से तैयार चटनी दी जाती है।
मेन्यू में क्या-क्या शामिल है
उनके मेन्यू में पोहा, पाव भाजी, इडली चाट, इडली सांभर, मसाला डोसा, वेज उत्तपम, चीज सैंडविच, आटे का केक, मसाला टोफू और कॉफी समेत कई हेल्दी फूड आइटम शामिल हैं। ज्यादातर व्यंजनों की कीमत 50 से 100 रुपये के बीच रखी गई है, ताकि हर वर्ग के लोग इसका आनंद ले सकें।
कहां और कब लगता है स्टॉल
सुबह साढ़े छह बजे से साढ़े दस बजे तक यह फूड कार्ट पटना जू के गेट नंबर-2 के पास लगाया जाता है। वहीं शाम को साढ़े पांच बजे से रात नौ बजे तक यह स्टॉल इको पार्क के गेट नंबर-3 के पास मिलता है। मॉर्निंग वॉक और शाम की सैर पर निकलने वाले लोग यहां हेल्दी स्नैक्स का स्वाद चखते हैं।
ड्रीम कार बनी आजीविका का आधार
उज्जवल बताते हैं कि कभी उनका कैंटीन का कारोबार खूब अच्छा चलता था और कई कर्मचारी उनके साथ काम करते थे। मगर कोरोना महामारी ने उनकी पूरी व्यवस्था हिलाकर रख दी। कारोबार बंद हो गया और हालात संभालने की उम्मीद में जमा-पूंजी भी लग गई, पर कोई फायदा नहीं मिला।
वे कहते हैं, 'कोविड से पहले एक कार खरीदी थी। कारोबार खत्म होने के बाद बस वही कार बची थी। तब पत्नी ने सुझाव दिया कि खाना बनाने का अनुभव तो है ही, इसलिए कार को ही फूड कार्ट में बदलकर लोगों को हेल्दी भोजन उपलब्ध कराया जाए। यह विचार पसंद आया और करीब दो-तीन साल पहले इसकी शुरुआत हो गई।'
तड़के 3 बजे से शुरू होता है दिन
उनका दिन सुबह 3 बजे ही शुरू हो जाता है। सबसे पहले पूरे दिन के लिए फूड आइटम तैयार किए जाते हैं। कुछ देर बाद पत्नी भी काम में हाथ बंटाने लगती हैं। तैयार खाने को कार में रखने के बाद वे पटना जू पहुंचते हैं और कार के पीछे ही छोटा सा स्टॉल सजा लेते हैं। सुबह की बिक्री के बाद शाम के लिए तैयारी होती है और फिर इको पार्क में स्टॉल लगाया जाता है।
एक बेटी बनी इंजीनियर, दूसरी की पढ़ाई जारी
आज यही फूड कार्ट उनके परिवार की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। इसी कमाई से उन्होंने एक बेटी को इंजीनियर बनाया है, जबकि दूसरी बेटी की पढ़ाई अब भी जारी है। हालांकि हर दिन एक जैसा नहीं गुजरता। कभी अच्छी कमाई हो जाती है तो कभी पेट्रोल का खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद वे लगातार मेहनत में जुटे हैं और अपनी ड्रीम कार को परिवार की आजीविका का मजबूत सहारा बना चुके हैं।
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