इक्कीसवीं सदी में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब मानवरहित यानी अनमैन्ड वॉर पर फोकस के साथ निवेश भी तेजी से बढ़ रहा है। बदलते सामरिक हालात को देखते हुए भारत ने आक्रामक रुख अपनाया है और अटैकिंग व डिफेंसिव दोनों मोर्चों पर हजारों-लाखों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। इसी कड़ी में भारत एक ऐसी परियोजना को गति दे रहा है, जिससे चीन और पाकिस्तान दोनों के पसीने छूटना तय है।
हाल ही में भारत ने 2 बिलियन डॉलर यानी 19074 करोड़ रुपये की लागत से ड्रोन खरीदने का फैसला किया है। इसके अलावा विभिन्न परियोजनाओं के तहत अलग से ड्रोन भी विकसित किए जा रहे हैं। देसी तकनीक से अगली पीढ़ी का लड़ाकू विमान बनाने के लिए भारत ने AMCA परियोजना शुरू की है, जिसके तहत पांचवीं और छठी पीढ़ी के विमान तैयार किए जाएंगे। छठी पीढ़ी का यह फाइटर जेट पायलट के साथ और पायलट रहित, दोनों मोड में उड़ान भर सकेगा।
आसमान से दुश्मन पर नजर
इसके साथ ही भारतीय वैज्ञानिक एक मिलिट्री सैटेलाइट नेटवर्क विकसित करने में जुटे हैं। इस योजना के तहत अंतरिक्ष में 52 उपग्रह स्थापित किए जाएंगे, जिससे जमीनी सुरक्षा के साथ-साथ समुद्री (मैरीटाइम) सुरक्षा की निगरानी और मजबूत होगी। चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और पाकिस्तान सीमा (LoC) पर होने वाली हर छोटी-बड़ी गतिविधि का रियल टाइम डेटा जुटाना आसान हो जाएगा। खास बात यह है कि इन उपग्रहों की मदद से ऑल वेदर मॉनिटरिंग का लक्ष्य भी हासिल किया जा सकेगा।
अपनी अंतरिक्ष आधारित सैन्य निगरानी क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए भारत ने करीब 27,000 करोड़ रुपये की लागत वाली SBS-III (Space Based Surveillance-III) परियोजना को तेज गति से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत 52 सैन्य निगरानी उपग्रहों का एक व्यापक नेटवर्क खड़ा किया जाएगा, जो चीन और पाकिस्तान से जुड़े संवेदनशील इलाकों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र पर चौबीसों घंटे निगाह रखेगा।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, SBS-III कार्यक्रम भारत की अंतरिक्ष आधारित खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) क्षमताओं को मजबूत करने की अब तक की सबसे बड़ी पहल मानी जा रही है। यह नेटवर्क वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC), भारत-पाकिस्तान सीमा और हिंद महासागर के रणनीतिक समुद्री इलाकों में होने वाली हलचल पर नजर रखेगा। परियोजना का मकसद संभावित खतरों को समय रहते भांपना और सैन्य बलों तक रीयल-टाइम जानकारी पहुंचाना है।
युद्ध रणनीति का अहम हिस्सा
इस परियोजना को भारत की नई संयुक्त सैन्य अंतरिक्ष सिद्धांत (Joint Military Space Doctrine 2025) का आधार मिला हुआ है। इस सिद्धांत में पहली बार अंतरिक्ष शक्ति को भारत की युद्ध रणनीति का अभिन्न हिस्सा माना गया है। साथ ही पृथ्वी की कक्षा और बाह्य अंतरिक्ष को एक ‘विवादित सैन्य क्षेत्र’ के रूप में स्वीकार किया गया है, जहां भविष्य के संघर्षों में रणनीतिक बढ़त पाने की होड़ और तेज होगी।
SBS-III कार्यक्रम को चीन के तेजी से फैलते याओगान (Yaogan) सैटेलाइट नेटवर्क और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। चीन पहले से ही बड़ी संख्या में निगरानी उपग्रह संचालित कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरण बदले हैं। ऐसे में भारत का यह कदम सामरिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है। पाकिस्तान ने भी चीन की मदद से भारत की निगरानी के मकसद से अंतरिक्ष में उपग्रह भेजे हैं, और अब भारत के इस महाअभियान से दोनों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।
हाइब्रिड पेलोड की ताकत
इस परियोजना की एक खास विशेषता इसका विकेंद्रीकृत उपग्रह ढांचा है। बड़े और सीमित संख्या वाले उपग्रहों पर निर्भर रहने के बजाय भारत कई लो-अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit) उपग्रहों का नेटवर्क तैयार करेगा। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था एंटी-सैटेलाइट हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी चुनौतियों के सामने अधिक सुरक्षित और लचीली साबित होगी। अगर किसी एक उपग्रह को नुकसान पहुंचता है तो भी पूरा नेटवर्क प्रभावित नहीं होगा।
इन उपग्रहों में अत्याधुनिक हाइब्रिड पेलोड लगाए जाएंगे, जिनमें सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) और ऑप्टिकल सेंसर दोनों शामिल होंगे। इस तकनीक की बदौलत खराब मौसम, बादलों या रात के अंधेरे में भी निगरानी संभव हो सकेगी। नतीजतन भारतीय सैन्य बलों को हर मौसम और हर समय सटीक जानकारी मिलती रहेगी।
निजी क्षेत्र की एंट्री
SBS-III परियोजना का एक और अहम पहलू निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी है। संशोधित अंतरिक्ष नीति 2026 के तहत 52 में से 31 उपग्रहों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंपी जाएगी। ये कंपनियां उपग्रह पेलोड, लॉन्च सेवाएं, सैटेलाइट बस और दूसरी तकनीकी प्रणालियां भी मुहैया कराएंगी। इसे भारत के अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में निजी उद्योग की भूमिका बढ़ाने की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार कई निजी कंपनियां इस कार्यक्रम में भाग लेने की तैयारी कर रही हैं। रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में लंबा अनुभव रखने वाली कंपनियों को बड़े अनुबंध मिलने की संभावना है। खासतौर पर एस्ट्रा माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स जैसी कंपनियां संभावित लाभार्थियों में गिनी जा रही हैं, जिनका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और रक्षा परियोजनाओं के साथ लंबा सहयोग रहा है।
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