प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब लगातार सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने के मामले में जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड से आगे निकल चुके हैं। ऐसे में चर्चा सिर्फ कार्यकाल की लंबाई तक सीमित नहीं रह जाती। एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर वह कौन-सी राजनीतिक शैली है, जिसने मोदी को इतने लंबे अरसे तक भारतीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा।
यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि उन्हें उनके पूर्ववर्तियों से अलग बनाने वाली बात आखिर है क्या। लेकिन इसका उत्तर केवल चुनावी जीत, लोकप्रियता या संगठन की मजबूती में नहीं छिपा है। असली कहानी भारतीय राजनीति की शैली में आए उस बदलाव की है, जिसने संसदीय लोकतंत्र के भीतर ही एक तरह की 'विशेष शैली' वाली राजनीति को जन्म दिया। दरअसल नेहरू और मोदी के बीच का फासला सिर्फ कालखंडों का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक युगों के बीच का है। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे दिग्गज नेता आए, मगर कोई भी नेहरू और मोदी जैसी दीर्घकालिक राजनीतिक केंद्रीयता कायम नहीं कर सका। तब प्रश्न यही उठता है कि नेहरू के बाद यह सिर्फ मोदी के लिए ही संभव क्यों हुआ।
जब चुनाव सांसद नहीं, प्रधानमंत्री चुनने का जरिया बन गया
इस संदर्भ में एक दिलचस्प पहलू सामने आता है। भारतीय संविधान ने देश को संसदीय लोकतंत्र दिया, जिसका मूल सिद्धांत यह है कि जनता सांसद चुनती है और सांसद प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं। लेकिन मोदी के कार्यकाल के दौरान बीते एक दशक में चुनावी व्यवहार का एक नया स्वरूप उभरकर आया है। मतदाता कई बार स्थानीय उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों और यहां तक कि राज्य सरकार के कामकाज से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नेतृत्व के आधार पर वोट देते दिखाई देते हैं।
इसकी शुरुआत वर्ष 2014 में ही हो गई थी, जब संसदीय चुनाव कम भाजपा बनाम कांग्रेस और ज्यादा मोदी बनाम व्यवस्था बन गया। इसके बाद 2019 का चुनाव आया, जो उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि 'मजबूत नेतृत्व' का चुनाव बन गया। वर्ष 2024 में भी भाजपा के प्रचार अभियान का सबसे बड़ा चेहरा मोदी ही रहे। यहीं से भारतीय राजनीति में एक अहम बदलाव झलकता है—संसदीय ढांचे के भीतर ही चुनाव का चरित्र राष्ट्रपति प्रणाली जैसा होने लगा, जहां पूरा चुनाव एक व्यक्ति की स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता पर केंद्रित हो जाता है।
हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं कि स्थानीय उम्मीदवारों या क्षेत्रीय मुद्दों की अहमियत खत्म हो गई। कई राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के नतीजों ने दिखाया कि स्थानीय समीकरण आज भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व-केंद्रित प्रचार की प्रवृत्ति पहले की तुलना में कहीं ज्यादा साफ नजर आती है।
रिकॉर्ड से बड़ी कहानी
मोदी के लंबे कार्यकाल की कहानी सिर्फ चुनावी जीतों की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक बदलाव की भी कहानी है, जिसमें प्रधानमंत्री का पद पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा केंद्रीय और प्रभावशाली दिखता है। भारत में मतदाता सांसद चुनते हैं और सांसद प्रधानमंत्री, लेकिन पिछले तीन लोकसभा चुनावों में चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा सीधे मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व और फैसलों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। साफ है कि यह स्थिति भारतीय संसदीय राजनीति के पारंपरिक ढांचे से कुछ अलग है। यही वजह है कि दोनों नेताओं की तुलना केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में उभरे और भिन्न राजनीतिक माहौल में काम किया।
जनता से सीधे जुड़ाव की शैली
मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता जनता से सीधे संवाद पर जोर देना रही है। अपने कार्यकाल में उन्होंने पारंपरिक सरकारी संचार के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो संदेश, वर्चुअल कार्यक्रमों और देशभर में नियमित जनसभाओं का व्यापक इस्तेमाल किया। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से प्रत्यक्ष संवाद और डिजिटल माध्यमों से लगातार संपर्क बनाए रखने की रणनीति ने उनकी सार्वजनिक पहुंच को और मजबूत किया।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी रेडियो, टेलीविजन और जनसभाओं के जरिए लोगों तक पहुंच बनाई थी, लेकिन डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के इतने व्यापक तथा निरंतर उपयोग के कारण मोदी का जनसंपर्क मॉडल अलग दिखाई देता है।
संसदीय व्यवस्था, लेकिन केंद्रीकृत राजनीति
राजनीति के जानकारों का मानना है कि मोदी ने चुनावी राजनीति को 'केंद्रीकृत शैली' का स्वरूप दिया है। इसका मतलब यह नहीं कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था बदल गई है, बल्कि यह कि चुनावों में मतदाता अक्सर स्थानीय उम्मीदवार के बजाय राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान करते दिखते हैं। कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व की बजाय मोदी के चेहरे को प्रमुखता दी। इससे प्रधानमंत्री का पद सिर्फ सरकार के मुखिया का पद नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।
नेहरू, इंदिरा और मोदी—तीन बड़े व्यक्तित्व
हालांकि भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति कोई नई बात नहीं है। नेहरू के दौर में कांग्रेस और नेहरू लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे। बाद में इंदिरा गांधी ने भी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान को पार्टी से ऊपर स्थापित किया। 'गरीबी हटाओ' अभियान से लेकर 1971 के चुनाव तक इसका असर स्पष्ट दिखा।
लेकिन मोदी युग की खासियत यह है कि यह दौर 24 घंटे चलने वाले मीडिया, सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और प्रत्यक्ष जनसंपर्क के समय में विकसित हुआ। 'मन की बात', सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विशाल चुनावी रैलियों और लगातार जनसंवाद ने प्रधानमंत्री की छवि को पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक बना दिया।
पार्टी से बड़ा चेहरा
मोदी युग की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि भाजपा के चुनावी अभियान का केंद्र अक्सर संगठन नहीं, बल्कि नेतृत्व होता है। भाजपा खुद एक मजबूत संगठन है, फिर भी चुनावी प्रचार में मोदी की लोकप्रियता उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है। इसका असर विपक्षी राजनीति पर भी पड़ा। कई चुनावों में विपक्ष का अभियान भाजपा के खिलाफ कम और मोदी के खिलाफ ज्यादा दिखाई दिया। इससे चुनावी मुकाबला अक्सर पार्टी बनाम पार्टी की बजाय नेता बनाम नेता का रूप लेने लगा।
क्या बदल गई है चुनाव की प्रकृति
मोदी के 12 वर्षों के लंबे कार्यकाल ने भारतीय राजनीति में एक और बदलाव को रेखांकित किया है। पहले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का व्यवहार अक्सर अलग-अलग होता था। अब कई चुनावों में राष्ट्रीय नेतृत्व स्थानीय मुद्दों पर भी भारी पड़ता दिखता है। इसके साथ ही राजनीतिक संचार का स्वरूप भी बदल गया है। योजनाओं की ब्रांडिंग, सीधे लाभार्थियों तक पहुंच और डिजिटल माध्यमों के जरिए संवाद ने प्रधानमंत्री पद को जनता के दैनिक जीवन से कहीं अधिक प्रत्यक्ष रूप से जोड़ दिया है।
रिकॉर्ड का असली अर्थ
नेहरू का रिकॉर्ड टूटना या कोई नया रिकॉर्ड बनना अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना हो सकती है, लेकिन उससे भी अहम यह समझना है कि मोदी का लंबा कार्यकाल भारतीय राजनीति में किस बदलाव का प्रतीक है। यह बदलाव केवल सत्ता में बने रहने का नहीं है। यह उस राजनीतिक मॉडल का उभार है, जिसमें प्रधानमंत्री चुनावी अभियान का केंद्र है, सरकार की पहचान का प्रमुख चेहरा है और राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का सबसे प्रभावशाली पात्र भी।
यही कारण है कि मोदी के लंबे कार्यकाल को सिर्फ वर्षों और दिनों में नहीं मापा जाएगा। भविष्य के राजनीतिक इतिहासकार संभवतः इसे उस दौर के रूप में भी याद करेंगे, जब भारत की संसदीय व्यवस्था के भीतर केंद्रीकृत शैली की राजनीति का असर सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
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