पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में गहराता संकट
बिजली की बेलगाम होती कीमतें, गेहूं के दाम में बेतहाशा बढ़ोतरी और प्रशासनिक मशीनरी की विफलता के खिलाफ उठने वाली आवाजें अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK और गिलगिट-बाल्टिस्तान में एक बड़े जनांदोलन में तब्दील हो चुकी हैं। इन इलाकों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने उस सच्चाई को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है, जिसे इस्लामाबाद वर्षों से पर्दे के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहा था। यह महज कुछ बुनियादी सुविधाओं की मांग नहीं, बल्कि पाकिस्तान के उन सियासी और आर्थिक दावों की पोल खोलने वाली घटना है, जो दशकों से खोखले साबित हो रहे हैं।
महंगाई और बदहाली से उपजा जन-रोष
इन प्रदर्शनों की जड़ें गहरी सियासी असंतुष्टि और आर्थिक तंगी में निहित हैं। पिछले कुछ वर्षों में, PoK में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) जैसे नागरिक संगठनों की अगुवाई में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए हैं। स्थानीय लोगों का स्पष्ट आरोप है कि उनकी उपेक्षा की जा रही है। दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुओं की भारी किल्लत, आसमान छूती महंगाई और पाकिस्तान द्वारा इन क्षेत्रों को केवल एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की नीति ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। लोग अब जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और यह आवाज हर गुजरते दिन के साथ और अधिक बुलंद होती जा रही है।
प्रशासन की विफलता पर उठते सवाल
ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के जांचकर्ताओं की रिपोर्ट पर गौर करें तो साल 2024 में हुए व्यापक प्रदर्शनों के पीछे मुख्य वजहें बिजली और आटे की सब्सिडी थीं। इसके अलावा, जनता का गुस्सा उन खास सुख-सुविधाओं के खिलाफ भी था जो स्थानीय नौकरशाहों और सियासी नेताओं को मुहैया कराई जाती हैं। जनता का आक्रोश केवल स्थानीय प्रशासन के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जिसके दम पर पाकिस्तान इन इलाकों में शासन चलाता है। आलोचकों का मानना है कि इस्लामाबाद ने सुरक्षा और संसाधन प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण फैसलों पर अपना शिकंजा इतना मजबूत कर रखा है कि स्थानीय निकायों की स्वायत्तता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
संसाधनों की लूट और लोगों का दर्द
मौजूदा आर्थिक संकट ने पाकिस्तान के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। प्रदर्शनकारियों का सबसे तीखा सवाल यही है कि जब PoK बड़ी मात्रा में हाइड्रोपावर यानी जल-विद्युत का उत्पादन करता है, तो वहां के निवासियों को ही महंगी बिजली क्यों खरीदनी पड़ रही है? स्थानीय संसाधनों से जो कमाई होती है, उसमें स्थानीय लोगों का उचित हिस्सा नहीं दिया जा रहा है। इन मांगों को सुलझाने के बजाय, प्रशासन ने उन पर दमनकारी नीति अपनाई है। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि विरोध को दबाने के लिए कम्युनिकेशन सेवाएं ठप की गईं, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां की गईं और सुरक्षा बलों का इस्तेमाल कर हिंसक झड़पें करवाई गईं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहराता विवाद
PoK में 2025 और 2026 के दौरान जारी अशांति के कारण कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और भारी संख्या में लोग घायल हुए हैं। यह सरकार की पक्षपाती नीतियों और आम जनता की उम्मीदों के बीच की खाई को स्पष्ट दर्शाता है। एक अन्य विवादास्पद मुद्दा विधानसभा सीटों का रिजर्वेशन है, जिसमें उन लोगों को शामिल किया जाता है जिन्हें 'जम्मू-कश्मीर का शरणार्थी' बताया जाता है लेकिन वे पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये सीटें केवल इसलिए बनाई गई हैं ताकि इस्लामाबाद चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सके। यह मुद्दा अब वहां के शासन की वैधता पर ही सवाल खड़े कर रहा है।
गिलगिट-बाल्टिस्तान की अपनी चुनौतियां
PoK के हालात से मिलती-जुलती स्थिति गिलगिट-बाल्टिस्तान में भी देखी जा रही है। वहां के लोग लंबे समय से संवैधानिक दर्जे, उचित टैक्स प्रणाली और स्थानीय संसाधनों के अनियंत्रित दोहन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद, वहां के लोगों को फैसले लेने की प्रक्रिया में कोई भागीदारी नहीं मिलती। विशेषज्ञों का कहना है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान की जनता अब अधिक स्वायत्तता और अपने भविष्य का फैसला खुद करने की मांग कर रही है। ये घटनाएं पाकिस्तान के सामने यह असहज स्थिति पेश करती हैं कि वह अपने कब्जे वाले इन इलाकों का प्रबंधन करने में पूरी तरह विफल रहा है।
भारत का रुख और अंतरराष्ट्रीय मंच
पाकिस्तान हमेशा वैश्विक मंचों पर कश्मीर मुद्दे को उछालकर भारत को घेरने की कोशिश करता है, लेकिन उसके अपने कब्जे वाले इलाकों के प्रदर्शनों ने उसकी गवर्नेंस की हकीकत को उजागर कर दिया है। अब वहां के लोग अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी उन समस्याओं की ओर खींच रहे हैं जो इस्लामाबाद की प्रशासनिक कमजोरियों का नतीजा हैं। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि पाकिस्तान को पीओके खाली कर देना चाहिए। उन्होंने साफ किया था कि पाकिस्तान के सीमा पार आतंक फैलाने के मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। अब वहां की बढ़ती आंतरिक अशांति ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान खुद अपने ही कब्जे वाले क्षेत्रों को संभालने में सक्षम नहीं है।
https://www.indiatv.in/explainers/pok-gilgit-baltistan-protests-raise-questions-over-pakistan-governance-2026-11-07-1253255