सर्दियों की शुरुआत के साथ बढ़ा चटपटे जायके का क्रेज
उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर आगरा न केवल अपने पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां का जायकेदार खानपान भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। मौसम का मिजाज बदलते ही आगरा वासियों के खानपान की पसंद में भी बदलाव दिखने लगता है। जैसे ही ठंड ने अपनी दस्तक दी, वैसे ही ताजनगरी में अलीगढ़ के मशहूर आलू के बरुलों की मांग में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। आमतौर पर आलू के बरुले अलीगढ़ की खास पहचान माने जाते हैं, लेकिन अब इनका लजीज स्वाद चखने के लिए आगरा के लोगों को अलीगढ़ जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।
शहर के बोदला-बिचपुरी मार्ग पर स्थित कलवारी चौराहे के पास 'अलीगढ़ वालों के मशहूर बरुले' के नाम से स्टॉल लगाई जाती है। शाम होते ही यहां गर्मागर्म बरुले का स्वाद लेने के लिए लोगों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। खस्ता और कुरकुरे बरुलों के साथ परोसी जाने वाली खास हरी चटनी इसके स्वाद को और अधिक बेहतरीन बना देती है।
किर्री आलू और शुद्ध सरसों तेल का अनोखा संगम
इस स्टॉल को चलाने वाले दुकानदार संटू सेन ने बरुले बनाने की पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस खास व्यंजन को तैयार करने के लिए आम आलू की जगह विशेष रूप से 'किर्री' यानी छोटे आकार के आलुओं का चुनाव किया जाता है। छोटे आलुओं का इस्तेमाल करने से बरुलों के स्वाद में एक अलग ही निखार आता है।
बरुले बनाने की विधि इस प्रकार है:
- पेस्ट तैयार करना: सबसे पहले बेसन, अरारोट और मैदा को मिलाकर एक गाढ़ा और चिकना घोल तैयार किया जाता है।
- आलू की कोटिंग: इस तैयार पेस्ट में छोटे आलुओं को डालकर अच्छी तरह से मिलाया जाता है ताकि आलुओं पर परत पूरी तरह चढ़ जाए।
- धीमी आंच पर तलना: इसके बाद आलुओं को शुद्ध सरसों के तेल में डाला जाता है और लगभग 15 मिनट तक धीमी आंच पर पकाया जाता है।
दुकानदार संटू सेन का कहना है कि धीमी आंच पर 15 मिनट तक पकाने की वजह से बरुले बाहर से एकदम करारे और कुरकुरे हो जाते हैं, जबकि अंदर से आलू पूरी तरह नरम और मुलायम बने रहते हैं।
15 मसालों और पालक से तैयार होती है जादुई हरी चटनी
संटू सेन बताते हैं कि केवल बरुले ही नहीं, बल्कि इसके साथ मिलने वाली हरी चटनी ही इस स्टॉल की असली पहचान है। इस खास चटनी को तैयार करने के लिए काफी मेहनत की जाती है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित सामग्रियां मिलाई जाती हैं:
- ताजा हरा धनिया और पालक
- घर के तैयार किए गए लगभग 15 मसाले
पालक, धनिया और 15 मसालों के अद्भुत मिश्रण के कारण चटनी में एक अनूठा चटपटा स्वाद आता है, जिसे खाने के बाद ग्राहक बार-बार खिंचे चले आते हैं। ग्राहकों को बरुले हमेशा ताजी तैयार हरी चटनी के साथ ही परोसे जाते हैं।
कीमत बेहद किफायती, दूर-दूर से आ रहे ग्राहक
अगर जेब पर पड़ने वाले असर की बात करें तो यहां बरुले बेहद वाजिब दामों पर उपलब्ध कराए जाते हैं:
- हाफ प्लेट: 20 रुपये
- फुल प्लेट: 40 रुपये
मात्र 20 रुपये में हाफ प्लेट और 40 रुपये में फुल प्लेट मिलने की वजह से आम लोगों से लेकर छात्र और नौकरीपेशा लोग भी यहां की स्टॉल पर जायका लेने पहुंचते हैं।
ग्राहकों की जुबानी, क्यों खास हैं यह बरुले?
स्टॉल पर चटकारे लेकर बरुले खा रहे स्थानीय ग्राहक गोविन्द सिंह ने बताया कि वह यहां के नियमित ग्राहक हैं और लगभग रोजाना बरुले खाने आते हैं। उन्होंने कहा कि यहां के बरुलों का जायका इतना बेमिसाल है कि शाम होते ही वह खुद को यहां आने से रोक नहीं पाते। खास तौर पर जो 15 मसालों वाली हरी चटनी दी जाती है, उसका स्वाद उनके दिल को छू लेता है।
वहीं एक अन्य ग्राहक जीशान ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वह खास तौर पर बरुले खाने के लिए मिडाकुर से यहां पहुंचे हैं। जीशान के अनुसार, यहां के बरुले बेहद स्वादिष्ट होते हैं। उन्होंने न केवल खुद वहां बैठकर बरुलों का आनंद लिया, बल्कि दूर रुके अपने दोस्तों के लिए भी बरुले पैक करवा कर ले गए।
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