रावलकोट में सुलगती बगावत की आग
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK के रावलकोट शहर में स्थित डी-चौक आज एक ऐसे इतिहास का गवाह बन रहा है जिसकी गूंज सीमा के पार तक सुनाई दे रही है। यहां की जनता और छात्र अपनी बुनियादी मांगों को लेकर सड़कों पर डटे हुए हैं। पाकिस्तानी फौज की ओर से की गई गोलीबारी और ड्रोन हमलों के बावजूद लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यह चौक केवल रावलकोट का एक प्रशासनिक केंद्र नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान के वर्षों पुराने शोषण और दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध का एक बड़ा प्रतीक बन चुका है। 38 सूत्रीय मांगों को लेकर शुरू हुई यह चिंगारी अब राजधानी मुजफ्फराबाद तक पहुंच गई है और इस भूचाल ने इस्लामाबाद के सत्ता गलियारों में खलबली मचा दी है।
डी-चौक: जनता के आक्रोश का केंद्र
जब किसी क्षेत्र में हुकूमत का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तो जनता का भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और यही स्थिति इस समय PoK में देखने को मिल रही है। भारत की सीमा से मात्र 600 से 700 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह क्षेत्र पूरी तरह से अशांत है। डी-चौक का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह रावलकोट शहर का मुख्य प्रशासनिक केंद्र है। यहां विरोध प्रदर्शन करने का अर्थ है कि सरकारी तंत्र के कामकाज को सीधे चुनौती दी जाए। इस स्थान के महत्व को समझने के लिए कुछ प्रमुख बिंदुओं पर गौर करना आवश्यक है:
- प्रशासनिक और रणनीतिक प्रभाव: डी-चौक शहर की महत्वपूर्ण प्रशासनिक इमारतों और बाजारों को जोड़ता है। यहां जब हजारों की संख्या में लोग धरना देते हैं, तो सरकार का कामकाज ठप पड़ जाता है।
- आंदोलन का मुख्य चेहरा: जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC ने इसी चौक को अपनी हुंकार का केंद्र बनाया है। आज यह पूरे PoK के नागरिक अधिकारों के संघर्ष का सबसे प्रमुख चेहरा बन चुका है।
- आसान पहुंच: अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, आसपास के गांवों और दूर-दराज के इलाकों से लोगों का यहां इकट्ठा होना काफी सरल है, जिससे आंदोलन को एक बड़ा जनसमर्थन मिलता है।
पाकिस्तानी सेना की बर्बरता और जनता का साहस
पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसियां लंबे समय से यह दावा करती रही हैं कि वे अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। हालांकि, रावलकोट के डी-चौक पर हुए अत्याचारों ने इस झूठ से पूरी तरह पर्दा उठा दिया है। जब निहत्थे प्रदर्शनकारियों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई, तो हुकूमत ने बातचीत का रास्ता अपनाने के बजाय गोलियों और बंदूकों का उपयोग किया। क्रूरता की हदें तब पार हो गईं जब रिहायशी इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों और उनके घरों को निशाना बनाकर ड्रोन से हमले किए गए। इस खूनी खेल में कई बेगुनाह लोगों की जान चली गई और दर्जनों अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद, जनता की हिम्मत नहीं टूटी और वे डी-चौक पर डटे रहे। गोलियों का डर अब लोगों के मन से पूरी तरह निकल चुका है, जो पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।
मुजफ्फराबाद तक फैली बगावत
यह आंदोलन अब केवल रावलकोट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आग की तरह फैलता हुआ PoK की राजधानी मुजफ्फराबाद तक पहुंच गया है। इस संघर्ष में अब युवा शक्ति यानी यूनिवर्सिटी के छात्रों का भी समावेश हो गया है। चेहला यूनिवर्सिटी और जामिया कश्मीर मुजफ्फराबाद के छात्र बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों को और सहन नहीं करेंगे। छात्रों ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के साथ मिलकर एक मजबूत मोर्चा तैयार किया है। उनकी मुख्य मांग है कि पाकिस्तानी सेना तुरंत अपना खूनी खेल बंद करे और जनता के छीने गए अधिकारों को बहाल करे। इतिहास गवाह है कि जब किसी क्षेत्र के युवा और छात्र सड़क पर उतर आते हैं, तो सत्ता का तख्तापलट होना निश्चित होता है।
आंदोलन की मुख्य जड़: 38 सूत्रीय मांगें
PoK में पनप रहा यह आक्रोश रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे पाकिस्तान सरकार की दशकों पुरानी वादाखिलाफी और वहां के संसाधनों का दोहन जिम्मेदार है। स्थानीय लोग बुनियादी आर्थिक अधिकारों, उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अपने प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक की मांग कर रहे हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का 38-सूत्रीय चार्टर उन मूलभूत जरूरतों पर आधारित है जिन्हें पाकिस्तान ने हमेशा नजरअंदाज किया है। बिजली के भारी-भरकम बिल, गेहूं पर दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती और आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। बार-बार आवाज उठाने के बाद भी जब सरकार ने केवल टैंकों और हथियारों का सहारा लिया, तो लोगों का धैर्य अब जवाब दे गया है।
भारत के करीब सुलगता लावा
रावलकोट की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। यह नियंत्रण रेखा यानी LoC के बेहद करीब है और नई दिल्ली से इसकी दूरी केवल 600 से 700 किलोमीटर के आसपास है। भारत के उत्तर-पश्चिम के सीमावर्ती राज्य इसके बिल्कुल पास स्थित हैं। ऐसे में जब भारत के पड़ोसी हिस्से में गृह-युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तो इसका अंतरराष्ट्रीय असर पड़ना स्वाभाविक है। पाकिस्तान की सेना अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी है। आर्थिक तंगी और दिवालियापन के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान के लिए यह आंतरिक विद्रोह एक बड़ा संकट बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर के लिए स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है।
भविष्य का संकेत: कुछ बड़ा होने वाला है
रावलकोट का डी-चौक आज इस बात का जीवंत प्रमाण बन चुका है कि किसी भी समाज पर जुल्म के दम पर लंबे समय तक शासन नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान ने PoK की मासूम जनता पर जितने भी सितम किए हैं, उन सभी के सबूत इस चौक की हर ईंट और वहां की गलियों में दर्ज हैं। जिस प्रकार से बुजुर्ग, छात्र और सामान्य नागरिक गोलियों की परवाह किए बिना सड़कों पर डटे हैं, उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि आने वाले समय में यहां कोई बहुत बड़ा राजनीतिक या भू-राजनीतिक बदलाव हो सकता है। पाकिस्तान का यह अवैध कब्जा अब उसी के लिए एक आत्मघाती कदम साबित हो रहा है और दुनिया इस पूरे घटनाक्रम को बड़ी गंभीरता से देख रही है।
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