शिक्षा और सपनों के बीच टूटी उम्मीदों का सफर
शिक्षा और करियर को लेकर हर युवा के कुछ सपने होते हैं और ओडिशा के रहने वाले बिभास साहा की कहानी उन युवाओं के लिए एक आईना है जो प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में खुद को अकेला पाते हैं। बिभास पढ़ाई में बहुत ही होनहार थे और उन्होंने अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान शानदार सफलताएं हासिल की थीं। उन्होंने स्नातक स्तर पर न केवल अच्छी पढ़ाई की, बल्कि राज्य स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। इसके बाद उन्होंने मास्टर डिग्री भी पूरी कर ली। परिवार को उम्मीद थी कि अब बिभास के करियर को पंख लगेंगे और वह जीवन में आगे बढ़ेंगे। लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। बिभास को अपनी योग्यता के अनुरूप मनपसंद नौकरी नहीं मिल सकी, जिससे वह गहरे अवसाद में चले गए और धीरे-धीरे उन्होंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया। इसी निराशा के दौर में एक दिन वह अचानक घर से लापता हो गए, जिससे उनका पूरा परिवार सदमे में डूब गया।
हावड़ा रेलवे स्टेशन पर मिले थे बिभास
परिवार ने बिभास की तलाश में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पुलिस स्टेशन में जनरल डायरी यानी जीडी भी दर्ज कराई गई थी, लेकिन महीनों तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। लगभग एक साल की लंबी खामोशी और इंतजार के बाद, जुलाई महीने में खबर आई कि बिभास हावड़ा रेलवे स्टेशन के परिसर में मिले हैं। जब उन्हें वहां देखा गया, तो उनकी हालत बहुत ही दयनीय थी। वह भूखे थे, गंभीर रूप से बीमार थे और पूरी तरह से बेसुध नजर आ रहे थे। रेलवे यात्रियों और स्थानीय पुलिस की सतर्कता से उन्हें समय रहते एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। वहां से उन्हें मिशनरीज ऑफ चैरिटी की कालीघाट शाखा ले जाया गया, जहां उनके स्वास्थ्य में सुधार के लिए इलाज की प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में उन्हें बेहतर देखरेख के लिए बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय केंद्र स्थानांतरित कर दिया गया।
स्मृति खोने के बाद भी नहीं छोड़ी उम्मीद
निर्मल हृदय केंद्र में भर्ती होने के बाद बिभास की शारीरिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार तो हुआ, लेकिन एक और बड़ी चुनौती सामने आई। मानसिक आघात के कारण बिभास अपनी याददाश्त पूरी तरह खो चुके थे। वह अपने घर का पता बताने या अपने परिवार के सदस्यों की पहचान करने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए समाजसेवी खोकोन मंडल से संपर्क साधा। इस मामले को सुलझाने के लिए खोकोन मंडल ने वेस्ट बंगाल रेडियो क्लब यानी हैम रेडियो की मदद ली। हैम रेडियो के सदस्यों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और बिभास की पहचान के लिए गहन खोजबीन शुरू कर दी।
हैम रेडियो की पहल से हुआ मिलन
हैम रेडियो की टीम ने अपनी तकनीक और नेटवर्क का उपयोग करते हुए बिभास के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। लगातार प्रयास के बाद, उन्होंने पाया कि बिभास का परिवार ओडिशा के बालासोर जिले के सहदेव कुंटा गांव में रहता है। हैम रेडियो के सचिव अंबरीश नाग बिस्वास ने तुरंत उस युवक की तस्वीर परिवार के पास भेजी। जैसे ही बिभास के बड़े भाई वासुदेव साहा ने वह तस्वीर देखी, वह उन्हें तुरंत पहचान गए। यह उनके लिए एक सुखद और भावुक कर देने वाली सूचना थी, जिसकी उन्होंने महीनों से कामना की थी। बुधवार को जब वासुदेव साहा बारुईपुर के निर्मल हृदय केंद्र पहुंचे और उन्होंने अपने खोए हुए भाई को देखा, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।
मानवता की अनूठी मिसाल
अपने भाई से मिलकर वासुदेव साहा बेहद भावुक हो गए। उन्होंने उन सभी लोगों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने बिभास को उस कठिन समय में सहारा दिया। वासुदेव ने बताया कि संस्था के लोगों ने जिस करुणा, स्नेह और संवेदनशीलता के साथ उनके भाई की देखभाल की, वह शब्दों से परे है। उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी और हैम रेडियो की टीम का दिल से शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि यदि ये लोग समय पर उनकी मदद न करते, तो शायद उनका भाई आज उनके साथ नहीं होता।
क्या है हैम रेडियो की भूमिका?
इस पूरे मामले में हैम रेडियो का योगदान अतुलनीय रहा है। हैम रेडियो, जिसे शौकिया रेडियो सेवा के रूप में भी जाना जाता है, केवल एक संचार माध्यम नहीं है बल्कि यह अक्सर आपदाओं, आपातकालीन परिस्थितियों और लापता लोगों को उनके परिजनों तक पहुंचाने में एक 'मसीहा' की तरह काम करता है। रेडियो ऑपरेटरों का यह नेटवर्क बिना किसी स्वार्थ के मानवता की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है। बिभास साहा का मामला यह दर्शाता है कि एक नेक नियत से किए गए प्रयास किस तरह एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ सकते हैं। यह कहानी इस बात की याद दिलाती है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे युवाओं को हमारे समाज में कितनी अधिक सहानुभूति, देखभाल और अपनों के साथ की जरूरत होती है।
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