दो-दो सरकारी नौकरियां छोड़ने का साहसिक निर्णय
वर्तमान समय में जहां देश भर के युवा एक सुरक्षित सरकारी नौकरी पाने के लिए सालों-साल कड़ी मेहनत करते हैं और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भटकते रहते हैं, वहीं झारखंड के देवघर जिले में एक बेहद अनोखी मिसाल सामने आई है। यहां के एक महत्वाकांक्षी युवा ने सरकारी नौकरी मिलने के बावजूद उसे छोड़कर एक ऐसी राह चुनी, जिस पर चलने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते हैं। उन्होंने नौकरी की पारंपरिक सुरक्षा को दरकिनार करते हुए स्वरोजगार का एक ऐसा मॉडल खड़ा किया है, जो आज मिसाल बन चुका है।
हम बात कर रहे हैं देवघर जिले के अंतर्गत आने वाले जसीडीह थाना क्षेत्र के बसमंडीह गांव निवासी अमित कुमार की। अमित ने अपनी दूरदर्शिता, कड़े परिश्रम और आधुनिक तकनीक के बल पर बिना किसी प्राकृतिक तालाब के विशाल स्तर पर मछली पालन का उद्यम स्थापित किया है। आज वह इस व्यवसाय से सालाना लाखों रुपये का कारोबार कर रहे हैं और कई अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
रोजगार सेवक से सचिवालय तक का सफर, फिर कृषि क्षेत्र में कदम
अमित कुमार का यह सफलता भरा सफर अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसके पीछे कई वर्षों का संघर्ष और नए विचारों को आजमाने की लगन शामिल है। उनके करियर की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई थी, जब उन्हें रोजगार सेवक के रूप में पहली सरकारी नौकरी मिली। इसके बाद वर्ष 2011 में उनका चयन झारखंड सचिवालय में हो गया। सचिवालय की नौकरी मिलने पर उन्होंने रोजगार सेवक का पद छोड़ दिया।
हालांकि, सचिवालय के दफ्तरी काम में भी उनका मन ज्यादा दिनों तक नहीं लगा। वह कृषि और स्वरोजगार के क्षेत्र में कुछ अनूठा करना चाहते थे। आखिरकार उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया और कृषि तथा मत्स्य पालन के क्षेत्र में संभावनाएं तलाशने निकल पड़े।
सात वर्षों तक देश भर के शहरों में लिया प्रशिक्षण
सरकारी सेवा से बाहर आने के बाद अमित ने बिना पूरी जानकारी के काम शुरू करने के बजाय खुद को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने का फैसला किया। वर्ष 2011 से 2018 के बीच उन्होंने देश के कई प्रमुख शहरों का दौरा किया और वहां जाकर विभिन्न कृषि तकनीकों का गहन अध्ययन किया।
इस दौरान उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख केंद्रों पर जाकर व्यावहारिक प्रशिक्षण और बारीकियां समझीं:
- मथुरा: उन्नत तकनीकों और कृषि पद्धतियों की समझ हासिल की।
- बाराबंकी: स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित व्यवसायों का अध्ययन किया।
- मुंबई: आधुनिक जलीय कृषि और व्यापारिक मॉडलों की जानकारी ली।
- कोलकाता: मछली पालन के पारंपरिक और आधुनिक तरीकों को समझा।
- हैदराबाद: मत्स्य पालन की नवीनतम तकनीकों और प्रबंधन की बारीकियां सीखीं।
लगातार सात वर्षों तक गहन प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने के बाद, अंततः वर्ष 2018 में अमित ने अपने महत्वाकांक्षी इंडोर फिशरीज प्रोजेक्ट की आधिकारिक शुरुआत की।
बिना तालाब कैसे होता है मछली पालन? समझिए आरएएस तकनीक
अमित द्वारा अपनाई गई इस विदेशी तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मछली पालने के लिए किसी बड़े प्राकृतिक तालाब या अत्यधिक कृषि भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रणाली में एक बड़े शेड के भीतर सीमेंट के मजबूत टैंक तैयार किए जाते हैं और इन्हीं टैंकों में नियंत्रित वातावरण के अंदर मछलियों का पालन-पोषण होता है। इस पूरी पद्धति को इंडोर फिशरीज कहा जाता है।
अमित इस परियोजना में RAS (रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम) तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं। इस आधुनिक प्रणाली के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:
- जल प्रबंधन: तकनीक के माध्यम से पानी को लगातार साफ और रीसाइकिल किया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी बेहद कम होती है।
- गुणवत्ता नियंत्रण: टैंक में पानी के तापमान, ऑक्सीजन स्तर और शुद्धता की निरंतर निगरानी की जाती है।
- सघन उत्पादन: सीमित जगह और कम पानी में भी अधिक संख्या में मछलियों का वैज्ञानिक तरीके से पालन संभव होता है।
- नियमित आहार: मछलियों को उनके विकास के अनुसार समय पर पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
50 लाख का निवेश और 4 एकड़ में फैला आधुनिक प्लांट
अमित कुमार ने इस विशाल इंडोर फिशरीज प्रोजेक्ट को शुरू करने में कुल 50 लाख रुपये की लागत लगाई। इस परियोजना को साकार करने में सरकार की तरफ से भी सहयोग मिला, जहां उन्हें 20 लाख रुपये का सरकारी अनुदान (सब्सिडी) प्राप्त हुआ। इसके अलावा शेष 30 लाख रुपये की राशि उन्होंने स्वयं अपनी जेब से लगाई।
वर्तमान में उनका यह अत्याधुनिक फिश फार्मिंग प्लांट कुल 4 एकड़ के बड़े क्षेत्रफल में फैला हुआ है। अमित के इस प्लांट में एक समय में लगभग 50 हजार मछलियों को एक साथ पालने और उनका रखरखाव करने की क्षमता है।
छह महीने में तैयार होती है उपज, 80 लाख का सालाना टर्नओवर
मत्स्य पालन की इस चक्र प्रक्रिया के तहत मछलियों को बाजार में बेचने योग्य आकार तक पहुंचने में तकरीबन छह महीने का समय लगता है। इन छह महीनों के दौरान पानी की सफाई, बैक्टीरिया नियंत्रण और आहार प्रबंधन पर 24 घंटे कड़ा पहरा रखना पड़ता है। थोड़ी सी भी लापरवाही मछलियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
अमित बताते हैं कि उनके इस प्लांट से वर्तमान में सालाना करीब 70 से 80 लाख रुपये का टर्नओवर हो रहा है। हालांकि, वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि टर्नओवर और शुद्ध लाभ में अंतर होता है। इस टर्नओवर में से मछलियों का दाना, बिजली का बिल, प्लांट का दैनिक रखरखाव और कर्मचारियों का खर्च भी शामिल होता है, जिसे घटाने के बाद शुद्ध मुनाफा बचता है।
युवाओं के लिए बने प्रेरणा, दे रहे स्वरोजगार का संदेश
कभी खुद सरकारी नौकरी की तलाश करने वाले और नौकरी करने वाले अमित कुमार आज न केवल एक सफल व्यवसायी हैं, बल्कि अन्य लोगों को रोजगार देने की स्थिति में हैं। उनके इस अनोखे और आधुनिक इंडोर फिशरीज प्लांट को देखने और समझने के लिए दूर-दूर से युवा, किसान और अध्ययनकर्ता बसमंडीह गांव पहुंचते हैं।
अमित का मानना है कि आज के युवाओं को सिर्फ नौकरी खोजने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी मेहनत, हुनर और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके खुद का उद्यम खड़ा करना चाहिए। देवघर में उनके द्वारा स्थापित यह इंडोर फिशरीज प्रोजेक्ट यह साबित करता है कि लीक से हटकर सोचना और नई तकनीक को अपनाना सफलता के नए आयाम खोल सकता है।
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